स्वयंसिद्धा

आज थोड़ा सा हट कर….एक सत्य कथा..

स्वयंसिद्धा…….

सुबह सबेरे डॉ के क्लीनिक में गये स्वास्थ्य की जाँच करवाने हेतु मेरी बेटी की उम्र की एक लड़की वहाँ झाडू पोछा का काम कर रही थी डा.साहब के आने में थोड़ा समय बाकी था सो उस बच्ची से उत्सुकता वश वार्तालाप शुरू किया..
. मैने पूछा बिटिया यहाँ इस काम के तुमको कितने रुपए मिलते उसने क्रमशः अपने पूरे दिन भर के श्रम की कीमत बताई बातों के दौरान उसने बताया की वह लगभग 12घंटे रोज़ कार्य करती है..पूछा कि उसके घर में कौन कौन है तो उसने घर के सदस्यों के साथ साथ अपनी जवाबदारी का भी ब्यौरा दिया…उसने बताया कि घर में उसके अपाहिज पिता हैं जो गेंगरीन का शिकार होकर अपने पैर खो चुके और पीने की आदत के चलते एक फेफड़ा खराब है पिता का इलाज कराना उसकी पहली प्राथमिकता थी सो सारी जमा पूँजी पिता के इलाज में खर्च हो गई साथ ही उसकी माँ का एक हाथ नहीँ है फ़िर भी उसकी माँ उसके साथ काम पर आकर हाथ बटाती है
पूछा की कितना पढ़ी हो बोली नवमी कक्षा तक..मैने उसके संघर्ष पर संवेदना प्रकट की तो गज़ब का जवाब दिया…आत्म विश्वास और आत्म सम्मान से भरा…एकाएक बोली….आपको सुनकर दुख लगा हो गा पर मेरे आँसू सूख चुके आज से दो वर्ष पहले रोई थी जब काम शुरू किया काफी बुरे हालातों में और अब वो मेहनत से काम करना सीख गई और बोली अब आने वाले समय दिनोंदिन अच्छा होगा उसके लिये…उसने कहा..मेरा जीवन मेरे मातापिता के लिये है और मैं खुश हूँ की अपना फर्ज अच्छे से निभा रही मुझे ज़िंदगी से और कुछ नहीँ चाहिये मुझे विवाह भी नहीँ करना…मैं उस स्वयम सिद्धा कॊ अवाक देखती रही उसका स्वाभिमान मुझे अंदर तक भिगो गया चलने लगी तो उसे कुछ रुपए देने चाहे चाय नाश्ते के नाम पर उस बच्ची ने लेने से साफ इंकार कर दिया जब मैने कहा की रुपए उसके कार्य की शाबासी हेतु है वो अन्यथा न लें तो बड़ी मुशिकलें से रुपये लिये और बोली आपने भी ज़िंदगी में बुरा दौर देखा है इसलिए मेरे से ऐसे पेश आई नहीँ तो आजकल कौन किसके दुख कॊ सुनता है यहाँ हर इंसान अपने दुख से दुखी है….अंततः वो अपने कार्य पर चली गई मैं लौटकर अपने घर पर उस… स्वयम सिद्धा…..कॊ नहीँ भूल पा रही जो श्रवण कुमार बनकर अपने फर्ज बखूबी निभा रही.. मेरा सलाम उसकी कर्मठता कॊ…..
संध्या अग्रवाल

         

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