एक क्रंदन जो चाहकर भी नहीं तोड़ पाता परिणय सूत्र बंधन।

एक क्रंदन जो चाहकर भी नहीं तोड़ पाता परिणय सूत्र बंधन।
सुनो,
कोशिश तो बहुत की,
इक तरफ़ा प्यार में,
जीवन के कोरे कागज़ पर
प्रेम रंग से पुष्प खिलाने की।
परिणय सूत्र में बंधकर भी
जो न हो सका मेरा
उसको अपना बनाने की।
कभी चुप रहकर
कभी हंसकर खुद को बहलाने की।
पर अब भूलने लगी हूं कला
हंसकर सब छिपाने की।

अब तो मैं कहीं भी रो पड़ती हूं बिलख बिलख कर फूट फूट कर,क्लास में पढ़ाते हुए,स्टाफ में बात करते हुए, प्रार्थना के समय फिर भागना पड़ता है वाशरूम में नल चलाकर रोने के लिए ताकि कोई तुम्हारे बारे में न जान सके।मन करता है चीखकर रोने का, तुमसे पूछने का कि ऐसा क्या किया है मैंने? पर तुम तो औरों में ही बिज़ी रहे, उन्हीं की फीलिंग्स ध्यान रहती है मेरी नहीं। मेरी तो आवाज़ सुनकर ही गुस्सा आता है तुम्हें। कुछ कहदूं तो घर से निकलने को कहते हो, पिछली बार नहीं गई थी पर इस बार रुक नहीं पा रही।अब स्वाभिमान धिक्कारने लगा है मुझे ।
आत्महत्या तो नहीं कर सकती पर जिंदा भी नहीं हूं मैं। रहूंगी तुम्हारे बिना, रहना पड़ेगा मुझे सबको दिखाने के लिए कि मैं खुश भी रह सकती हूं इसलिए ये शहर छोड़ दूंगी ताकि तुमसे दूर रह है ए‌। सकूं। एक उम्मीद थी या ग़लत फहमी कि शायद तुम मुझे समझते हो या कभी तो समझोगे,पर तुम हर बार एक नया झटका देते हो। बहुत कोशिश की मैंने कि ये जन्म तुम्हारे साथ निकल जाए पर तुम्हें मंजूर नहीं।तो ठीक है, बहुत इच्छा थी कि तुम्हें बुढ़ापे में अकेला छोड़ कर जाऊंगी , तुमसे अपने अकेलेपन का बदला लूंगी और ऊपर से तुम्हें रोता देखकर खुश होऊंगी। पर तुमने तो मुझे पहले ही जाने को कह दिया। अपना ध्यान रखना।
नीलम शर्मा ✍️

         

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