**सहयात्री किताब और यात्रा**

यात्रा के समय किताबों का साथ शायद अब एक याद हीं बन कर रह जायेगी ।वैसे तो अब भी कुछ लोग यात्रा शुरू करने के ठीक पहले स्टेशन पर के किताब की दुकान से पत्रिका व कहानी की किताब या उपन्यास खरीद लेते हैं।पन्नों पर लिखे अक्षरों को पढ़ने की वैसी चाहत और लगन अब शायद कम होती जा रही है ।

आज आप को दूर दराज के किसी भी देश या अपने ही देश में किसी शहर में जाना हो तो हवाई जहाज से यात्रा करने की सुविधा का उपयोग साधारण आय वर्ग के व्यक्ति भी अब आसानी से करते हैं ।कुछ घंटों में हम कई- कई हजार मील की दूरी तय कर लेते हैं ।

बीते दिनों के सफर की यादों में हम याद करते हैं वह स्टेशन पर पहुँचना और स्टेशन के किताब की दुकान पर जाकर लगभग हर तरह की पत्रिका खरीद लाना। कभी -कभी मन किया तो एक दो कहानी की किताबें या उपन्यास ले आना ।अपने स्थान पर व्यवस्थित होकर बैठने के बाद किताबों के पन्ने पलटना शुरू करना और देखते -देखते सारी किताबों को पढ़ जाना ।अपने सारे पन्ने पढ़ जाने के बाद अपने सामने वाली सीट पर बैठे या अपने बगल वाली सीट पर बैठे लोगों की किताबों के पन्ने पर नजर डालना और ऊपर- ऊपर जो भी अक्षर पढ़ाई में आ जाए उनको पढ़ने की कोशिश करना। इधर थोड़ा उधर थोड़ा देख कर मुस्कराना और फिर धीरे से कहना क्या मैं आपकी किताब ले लूं कुछ देर पढ़ने के लिए और फिर उन किताबों को भी पूरा पढ़ जाना। कई बार जब किताब पड़ी हुई ना मिले और सामने वाला व्यक्ति पढ़ रहा हो तो उसकी किताबों के पन्नों पर नज़र गड़ा देना जो कुछ भी दिख रहा हो चित्र या अक्षर उनमें ही ऐसे डूबना जैसे कि वह उसके साथ साथ ही पढ़ रहा है। कई बार तो इतनी ज्यादा उस किताब में डूब जाते कि सामने वाला परेशान हो कर कहता है आपको यह पढ़ना है क्या पहले आप ही पढ़ लीजिए ।

याद आता है तब किताबों का एक ढेर लिए किताब बेचने वाले का बार- बार आना और उसके पास की सभी किताबों को उलट-पुलट कर देखना कुछ समझ में नहीं आए तो कोई भी या तो रफी की प्यार भरे गाने लता के हिट गीत या किशोर के बेहतरीन गीत मुकेश के दर्द भरे गीत हीं उनसे खरीद लेना और तो और रसोई चटनी अचार मेहंदी या चुटकुले या भविष्य बांचते किताबें ही उनसे ले लेना ।उनसे किताबों के दाम पर थोड़ा मोलभाव करना।

ऐसा नहीं कि अब यह नहीं है अभी भी किताबें बिकती है पर उनकी संख्या अब समय के साथ कम होती जा रही हैं आस-पास पन्ने हैं कागज हैं पुरानी आदतों के कारण अभी भी हम किताबें खरीदी लेते हैं। वह शिद्दत वह लगन वह सह यात्रियों से किताब के चलते एक मुस्कान का देना और लेना वह शायद कहीं खो गया है।अब तो अपने मोबाइल फोन पर ज्यादा समय व्यतीत होता है । बीच-बीच में नेट वर्क नहीं मिलता हम जानने की कोशिश करते रहते हैं कि नेटवर्क मिल रहा है या नहीं ।नेटवर्क मिलते हैं जल्दी-जल्दी हम उसका उपयोग करने लगते हैं ।

ऐसा नहीं कि अब लोग पढ़ना नहीं चाहते ।ऐसा भी नहीं की लिखने वालों की कमी हो गयी हो।आज कल लिखने वाले भी इंटरनेट पर लिखा हुआ साझा करते हैं और पढ़ने वाले भी इंटरनेट पर हीं अपनी पसंद को तलाश कर पढ़ने का आनंद ले सकते हैं। सोचने समझने का विषय यह है कि क्या पन्नों पर लिखा पढ़ना धीरे धीरे इतिहास बन कर रह तो नहीं जायेगा ।

कागज पर लिखे का पक्ष और विपक्ष दोनों है । पक्ष की इसपर लिखा कालांतर तक संजोया जा सकता है ।हमारा जब भी मन हम उन्हें उलट पलट कर छू कर देख सकते हैं । कागज का विपक्ष की यह हमारे प्रकृति का दोहन कर रहा और पर्यावरण में कचरा बढ़ाता है ।इसके विपक्ष में जो भी कहा जाये पर इसके पक्ष की मजबूती को हम नकार नहीं सकते।अव्वल तो यही होना चाहिए की हमें पेड़ पौधों से बने कागज उपयोग करना बंद कर के ऐसे कागजों का उपयोग करना चाहिए जो प्राकृतिक साधनों से न बना हो । पन्नों पर लिखने और पढ़ने की आदत को बनाया रखना बहुत हीं जरूरी है न सिर्फ भविष्य में याद रखने के लिए अपितु भावनात्मक रूप से जुड़ने के लिए भी ।

         

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