कुण्डलिया

१)लिखते लिखते थक गई समझ नही कछु आत !
कभी कहीं मात्रा बढ़ी.. भटक कही लय जात !!

भटक कही लय जात …फसे हैं नाप तोल में !
नींद उड़ गई रात ……गुजर गइ इसी झोल में !!

किसे कहे संध्या …….स्वप्न में कुंडल दिखते !
भूली में सब छंद ..कुंडलिया लिखते लिखते !!

२) चले सँवर के बलम जी…..अपने फिर ससुराल।
लड्डू पापड़ आचार…..भी धर अपने साथ ।।

धर अपने हाथ चल…..रहे कर चौड़ी छाती।
पत्नी की सेवा अब….हम को रास ना आती।।

कूटनीति में सासु…..निकली सबकी सरताज।
बेलन खा सासु जी… के बलम घर लौट चले।।

📝संध्या चतुर्वेदी
#मथुरा यूपी

         

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