जय जयकार गधों की है

चारों कौनो मे गूंज रही ,
वो जय जयकार गधों की है ।
देश को है जो लूट रहे ,
ऐसी सरकार गधों की है ॥

पल पल संसद मे होती ,
वो हाहाकार गधों की है ।
गांव से लेकर शहरों तक ,
बस भरमार गधों की है ॥

(देश को जो है लूट रहे ,
ऐसी सरकार गधों की है ।)

गधों की सत्ता मे होती ,
अब गधों की हाहाकारी है ।
कल तक था जो गधा गली का
अब बो ही सरकारी है ॥

जोरों शोरों से होती ,
अब तो प्रचार गधों की है ।
हर साल तिबल हो जाती है ,
ये पैदावार गधों की है ॥

(देश को जो है लूट रहे ,
ऐसी सरकार गधों की है ।)

उनकी सरकार बनाने मे ,
अपनी ही मत होती है ।
अगले 5 सालों तक फिर ,
जनता की गत होती है ।

बेवस होकर ”साहिल” सहते ,
सब अत्याचार गधों की है ।
देश को जो है लूट रहे ,
ऐसी सरकार गधों की है ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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