पत्नी चालीसा….. समर्पयामि

पत्नी चालीसा….. समर्पयामि ……………

तुम बिन होत नहीं कारत कोई।
विपदा आई पति पर, जब..जब तुम सोई।।
चारों धाम की तीर्थ तुम्ही हो……
तुम ही काशी… तुम ही मथुरा………
मैं दीन-हीन, दरिद्र पशु नर बेकारा।
सर्वस्त्र तुम्ही हो, तुम्हारा जयकारा।।
बेलन ज्यों-ज्यों, तुम्हरे हाथ में आया,
पति बेचारा त्यों -त्यों चिल्लाया।।
तुम बिन यज्ञ, मंगल कार्य न होवें।
पति निरक्षर, मूषक होवे।।
इस धरा की आन तुम्ही हो,
पृथ्वी का वरदान तुम्ही हो………..
तुम ही दुर्गा.. तुम ही काली।
तुम बिन जग वीराना खाली ।।
जो कोई तुमको नहीं है ध्यावत।
वह जग में “उल्लू” कहलावत।।
तुम्हरी याद में ताज बनायो, तब शाहजहाँ ने नाम कमायों।
तुम भी सुन्दर सी साड़ी दे आओ,
समझो मंदिर में कोई फूल चडायो।।
तुम ने ज्यों कारवां चौथ व्रत राखा।
पति का ना हो बाल न वांका ।।
पर जो पति – पत्नी को नित्य मारे घूँसा।
उसका तो भगवान् भरोसा……………
-कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

         

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