बिल्ली के गले में घंटी

बिल्ली के गले में घंटी भला कौन बांधेगा भाई I
कितने बरसों बीत गए, समस्या सुलझ न पाई I
कुछ लेखक-विचारक चूहे उठे और निर्भय होकर I
जमकर कोसा रचनाओं में ..बड़ी आवाज उठाई I
ज्यादा बुलंदी पर पहुँचा जब स्वर, तब बिल्ली ने I
उग्र देशभक्त चूहों की एक सुन्दर सी सभा बुलाई I
महान सम्मान के साथ सारा योगदान गिनवाकर I
महामूषक,परम मूषक, श्रीमूषक उपाधियाँ बरसाईं I
सारे मूषक गद्गद हो ससम्मान घर को लौटे, फ़िर I
बिल्ली के विरुद्ध किसी ने न कोई आवाज़ उठाई I
संस्थाओं ने बिल्ली के भ्रष्टाचारों को जनता तक ला I
भ्रष्ट व्यवस्था के समूल नाश की खूब लड़ी लड़ाई I
सुनते हैं उन संस्थानों के भी फ़िर बदल गए दिन I
दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की और बढ़ने लगी कमाई I
चुनावों का मौसम आया कुछ नयी व्यवस्था लाया I
फ़िर बिल्ली की सत्ता बदली नयी एक बिल्ली आयी I
अब सालों की लम्बी निद्रा से जागेंगे नए-पुराने चूहे I
असहिष्णुता, भ्रष्टाचार की पुनः मचेगी नयी दुहाई I
फ़िर कुछ संस्थाओं में देशभक्ति की आग लगेगी I
सम्मानों अनुदानों की चहुँ ओर देगी गूँज सुनाई I
लोकतंत्र के रंगमंच पर ऐसे ही बिल्ली बदलेंगी I
चाटुकारों की मौज मगर भूखे चूहों की वही रुलाई I
घंटी बाँधने के प्रयास का झूठा नाटक चला करेगा I
कागज़ पर तूफान उठेंगे शब्दों से होगी छद्म लड़ाई I
© तनूजा उप्रेती,

         

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