बुरा जो देखन मैं चला

संमस्या पर विचार विमर्श
विषय न तुम करो न हम करे ,,,, बुराई निंदा को ख़त्म करें ।

*बुरा जो देखन मैं चला* ,
*बुरा न मिलयो कोय*।
*जो देखन आपसा*
*मुझसा बुरा न कोय।।*
सूफी कवि कबीर दास जी ने आज से लगभग 600 साल पहले ये बात समझाने की कोशिश समाज सुधार के लिए बतायी थी,
पर
*ढाक के तीन पात*
या
*कुत्ते के पूंछ के समान टेढ़ी की टेढ़ी*
*ये आदत हमारी*
कबीर दास जी के बाद मोहन दास करम चंद गांधी जी आये ,
वे अपने साथ तीन बंदर के माद्यम से हमे , समझाने की कोशिश की।
तीन बंदर याद आया?
एक बन्दर आँख में हाथ रख आंख बंद किया ,
हमें समझा रहा था ,, बुरा मत देखना ।
दूसरा बन्दर हमे समझा रहा, कान को ऊँगली से बंद कर बुरा मत सुनिये ।
तीसरा बन्दर अपने मुख पर हाथ रख बड़े ही तन्मयता से मौन रहने की सीख देते बता रहा , देख लिए , सुन लिए पर अब बोलना नहीं ।
पर क्या होता ।
यहाँ तो,, *कानो देखी आंखें सुनी*
के साथ चारी चुगली की सुन्दर, मीठी, रस भरी, रहस्य और रोमांच से आच्छादित मिर्च मसाले युक्त बात कानों में रस घोलती कितनी मधुर लगती।
और एक राज की बात
सुन रे सखी ?
ये बस तेरे को बता रही , कसम से?
किसी को और न बताना ।
अर्थ के गहरे भाव पर
क्या हम सब कुत्ते के पूंछ आज भी ?
नवीन कुमार तिवारी,,

         

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