महफ़िल में दरोगा बुला रख्खे हैं..

उजले कपडों से दाग अपने दामन के छुपा रख्खे हैं ।
छोड़ो भी यार वकीलों से रिश्ते तुमने बना रख्खे हैं ॥
एक मेरी ऊँगली उठाने से भला क्या होगा हासिल ।
तुमने तो अपनी महफ़िल में दरोगा बुला रख्खे हैं ॥
-कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

         

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