वादा

कविता-वादा

ओढ़ चादर विचारों की
सो गया कल के लिए
पर ख्याल न था..
माँ के फटे आँचल के लिए
मिलने अपनी महबूबा से..
मिलने अपनी नारी से
मिलने अपनी यारी से पर,
अच्छा इरादा कर लेना।
माँ बाप से भी ऐ मुसाफिर…
कोई अच्छा वादा कर लेना।

टूटे होंगे बाप के जूते..
माँ की साड़ी भी फटी होंगी।
नौ महीने गर्भ में रखा,
कैसे दर्द की रात कटी होंगी।
हर एक अपना निवाला..
तेरे हलक से उतारा है।
तेरे लिए वो कुछ भी नहीं पर
उनके लिए तू तारा है।
कर्ज न होगा उनका चुकता
चाहे जीवन आधा कर लेना।
माँ बाप से भी ऐ मुसाफिर..
कोई अच्छा वादा कर लेना।।

बदलना है समय का चक्र
ये रात..ये दिन ढ़लना है
मैं की गठरी कंधे पर रख
तुमको कभी न चलना है
कुछ नहीं अटल यहाँ..
पर्वतों में भी रवानी है।
कोई नहीं अपना-पराया..
सपनों की जिंदगानी है।
कुछ न धरा सँवरने में
ये चोला सादा कर लेना।
माँ बाप से भी ऐ मुसाफिर,
कोई अच्छा वादा कर लेना।।

रोहताश वर्मा”मुसाफिर”

         

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