श्राद्ध हो रहे है

डिग्रियां ढेरो है लेकिन
योग्यता की ही कमी है ।
चेहरे पर मुस्कान है पर
आंख में थोड़ी नमी है ॥
सियासत के चक्कर मे
युवा बरवाद हो रहे है ।
आ रहा है अब समझ
शायद श्राद्ध हो रहे है ॥

आंएगे नेताजी शायद
करेंगें फिर कांव कांव ।
शहर की हर एक गली मे
और फिरेंगे गांव गांव ॥
प्रलोभन नौकरी का देकर
भिखमंगे आबाद हो रहे है ।
युवाओं के तो भरी जवानी में
शायद श्राद्ध हो रहे है ॥

पिण्डदान में चोंच मारकर
संतुष्ट करके आमजन को ।
लुप्त हो जाएगें फिर वो
छोड़ के पीछे पवन को ॥
इनके महलों में ही सब
अपराध हो रहे है ।
समाज में हर तरफ
बस श्राद्ध हो रहे है ॥

दौलत मिलेगी शौहरत मिलेगी
इन्ही का बस मजा है अब ।
दयनीय स्थिति है किसान की
मेरे लिए सजा है अब ॥
नेता पीठ की खुजली से थे
अब जांघ की दाद हो रहे है ।
”साहिल” सच्ची कह रहे है
शायद श्राद्ध हो रहे है ॥

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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