Category Archives: कविता (संदेशात्मक)

बस यूं ही……

बस यूं ही…… विश्वास, भरोसा, निष्ठा, यकीं और ऐतबार लगी है सेल इनकी,बिक रहे सरे बाज़ार। शब्दों के संसार में हैं,सर्वाधिक क्षतिग्रस्त ये, हालांकि धोखे छल कपट से रहते हैं त्रस्त ये। भरोसा और धोखा अक्सर पर्याय बन पूरक से लगते भरोसे की गुणवत्ता पर ही तो हैं अनंत धोखे टिकते। ईश्वर में विश्वास,भरोसे की […]

ऐसे मने दीवाली

मन के सारे द्वेष मिटाओ , हरो दिलों की पीड़ा । भेदभाव का भाव न रक्खें , बजे प्रेम की वीणा ।। सबके घर में हो खुशहाली , माता ऐसे मने दिवाली। सबके घर में हो खुशहाली , माता ऐसे मने दिवाली ।। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई , सब है भाई भाई । मन में […]

दीपावली विशेष कविता : कच्चे दिये बना कर बैठ गई!

कच्चे दिए बना कर बैठ गई वो उम्मीद सज़ा कर बैठ गई! मेरी दिवाली भी रोशन होगी वो भी आस लगाकर बैठ गई! कोई न आया दिये लेने पास वो बहुत  हतास और निराश कैसे  खुशियाँ  आयेगी पास वो निराश – उजागर बैठ गई! रंग  बिरंगी  सी है दुनियाँ यहाँ  किसी  की फ़िक्र कहाँ अपना- अपना […]

मुझे नयन कारे-कारे ला के दे दो

शाम ढ़ल चुकी,मुझे आसमाँ के तारे ला के दे दो एक,दो नहीं चाहिए,मुझे सारे के सारे ला के दे दो जिस में छिपा सकूँ मैं अपने सारे ख़्वाब हसीन किसी गोरी के मुझे नयन कारे-कारे ला के दे दो तुम गाँव में शहर बसाने चले हो तो इतना करो मेरे दोस्त-यार के मुझे चौक-चौबारे ला […]

मजबूर मज़दूर

हर _तस्वीर _कुछ_ कहती_ है । विधा -कविता दिनांक – 7/10/ 18 दिन -रविवार पसीना पहले, फिर खून के आँसू बनकर बहें धारे बनाकर ताज चाहत का,नज़राना भेंट चढ़ते हम। सुनो यूं ही नहीं बन जाती महल, पत्थर की दीवारें हैं माटी ईंट पत्थर का, सिर पर बोझ उठाते हम । सुनो यूं ही नहीं […]

गाँधी तेरी लाठी करती यही पुकार

गाँधी तेरी लाठी करती ये पुकार हो रहा है कितना देखो अत्याचार जात-धर्म से हो गए,सब यहाँ लाचार ईमान का भी हो रहा खूब व्यापार गाँधी तेरी लाठी करती ये पुकार लूट-पाट,दंगो की दुकानें चल रही बहू-बेटियों की अस्मिता लुट रही मंदिर-मस्ज़िद भी फल-फूल रही इन सबसे भरा हुआ है अख़बार गाँधी तेरी लाठी करती […]

जीवन देश समाज

पहना टोपी, बनाके बकरा, नेता करते चुन चुन चू अपना उल्लू सीधा करके, कहते जनताwho are you? देश दशा हुई दिशाहीन, फिर आधुनिकता का दिखावा क्यूँ। घर की मुर्गी तो दाल बराबर, करती नहीं अब कुकड़ू कू। बाबाओं के फेर में पड़कर, जीवन, समाज, देश डूबा क्यूँ। देश दशा हुई दिशाहीन, फिर आधुनिकता का दिखावा […]

आर• सी• एम•

आर सी एम ……!!! जीवन जीने का सलीखा ….. घुल गया जो.. जीवन पथ में तो….यक़ीनन.. तुम्हारी सांसो को महका देगा…. आर सी एम … तुम्हे बढ़ना सीखा देगा…..! थाम लेगा तुम्हारे हाथ हर बार….. तुम्हे दुनिया को जीतना सीखा देगा…… इक बार चला जो.. तुम्हारे साथ…….यक़ीनन.. तुम्हारी राहो को आसान बना देगा….. आर सी […]

चीख़

” चीख ” बड़ी डरी सी रहती हूँ जब घर से निकलती हूँ महसूस होता है जैसे निगाहें पीछा करती है, कहीँ झिंटाकसी कहीं निगाहों में हवस क्यों हमे चीज समझते हो भद्दे वार करते हो, मैं भी तुम जैसी हूँ हमारी रचना एक सी है शारीरिक रचना में तुमसे थोडा भेद है, मानव मातृत्व […]

मुस्कान और मानसिकता

मुस्कान लिए फिरते हैं, देखो बनावटी चेहरे हैं। क्या कहूँ चेहरों की बातें, भाव नकली उकेरे हैं। भीतर मन-मन छल कपट, वाणी फूलों के सेहरे हैं। अपनेपन के भाव न जाने, किस सराय में ठहरे हैं। झूठ फरेब के घात-प्रतिघात से, हृदय घाव सा रिसता। कुंठित,संकीर्ण,ओछी सोच हुई,,,हृदय चोर है बसता। मतलब के चूल्हे पर […]

हर सच्चा दोस्त दोस्ती में याद आता हैं-

मेरे ख़ामोश लबो को पहचान जाता हैं।। हर सच्चा दोस्त दोस्ती में याद आता हैं।। खूब परवाह एक दूसरे की करते सभी हैं।। मुसीबत में सिर्फ दोस्त ही नज़र आता हैं।। वो साथ बिताये पल भी खूब याद आते हैं।। स्कूल,कॉलेज हर जगह दोस्त बन जाते थे।। दोस्तों के टिफ़िन से खूब खाना चुराते थे।। दोस्त पूछे […]

स्वाभिमान

स्वाभिमान को मारकर जीना यह न तुम स्वीकार् करो ओरों के उपकार पर जीना, खुद पर है धिक्कार अहो। माना परिभाषाएं स्वाभिमान की,बस शब्दों में सीमित हैं। मूल्य संज्ञान अब स्वाभिमान का बस किस्सों में संचित है। स्वाभिमान को तुम अपने, कभी अहंकार बनने न देना। सम्मानों के उच्च मंच,पर स्वाभिमान को झुकने न देना। […]

हीर

||यूँ ही मलंग ना हुआ होगा रांझणा|| ||इश्क़ फकीरी कर..तुझे हीर मिलेगी|| 💖 ना रे ना पढ़ी जाएगी हीर …!!!! ★ जो मैं कहूँ हीर न पढ़ पाऊँगी तो मेरी ये बात पर तंज न होना बहुत ताब है हीर में हीर की रूह में नहीं जानती हीर की गहराई नहीं जानती हीर की परछाई […]

गोदभराई

……….✍️ #गोदभराई मेरी कविता तुम्हारे कवि मन की ब्याहता हुई !! व्याकरण का भाव सौंदर्य उच्चारण के मंत्र शब्द शैली की लगनवेदी पर क्षणिका गठबंधन हुई !! धीरे धीरे मन आँगन में भाषाशिल्प बिम्ब रचने लगा नाद और लय का संगम नव रस को अलंकृत करने लगा !! दैहिक संज्ञा को भुलाए मनसा समागम में […]

चैतन्य राग

✍️……#चैतन्य_राग~ यूँ ही नहीं उठा है निनाद मेरे भीतर कोई तो ले रहा है विस्तार मेरे भीतर !! ये दिव्य कल्पना है या है यथार्थ वाणी जय घोष कर रहा है ये कौन मेरे भीतर !! संगम के घाट पर जब उठती तरंग कोई चैतन्य राग बन कर गाता है कौन भीतर !! दैवत्व दीप […]

चुप रहे

रात जागती रही ख्याल चुप रहे ख्वाबों के गांव में सवाल चुप रहे !! राख दहकती रही चिराग चुप रहे बूँदों की चाह में बवाल चुप रहे !! शाख मचलती रही पराग चुप रहे कागज़ पर देखो उबाल चुप रहे !! चिनार पर शमा जलती रही बिखरे रहे तन्हा किनारों पर ताउम्र सैलाब चुप रहे […]

कहां ढूंढता मानव तू ,

कहां ढूंढता मानव तू ,उक़बा, ख़ुल्द,बहिश्त और जन्नत। इरम,ग़ैब,कौसर सब यहीं है,तू कर्म कर और मांग मन्नत। स्वर्ग, बैकुण्ठ, परलोक,सुरलोक और देवलोक भी यहीं है। प्राकृतिक सौंदर्य ग़र बचाले, स्वर्गिक परिवेश फिर यहीं है। भारत था कभी स्वर्णिम पक्षी,गर्व अभी तक होता है। स्वर्गिक उज्ज्वल सा भविष्य,सबकी पलकों में सोता है। होंगे पूरे जन्नत के […]

झूठा जहान

जब सूरज के उगने की बंदिश न होगी चाँद के अस्त होने से रंजिश न होगी न होगा हवाओं का पहरा न सर पे मजबूरियों का सहरा न गहराई प्यार की जांचनी होगी न ऊंचाई कद की मापनी न होगा कहीं भरम न कुछ जागरूकता का मरम न जीने की कवायद होगी न मरने का […]

कृष्ण उद्धव संवाद

उद्धव पूछते है प्रशन ,कृष्ण भगवान से। आप ने पांडवो से सच्ची मित्रता निभाई कहाँ ईमान से। चाहते तो युधिष्टर को जुआ खेलने से रोक देते। या पासो को उनके पक्ष में मोड़ देते। मामा शकुनि पासे पे पासा फेकते रहे। युधिष्टर हारता रहा , आप देखते रहे। आप के देखते देखते द्रोपदी दाव पर […]

कैसे मन हो मेरा नगीना

मैं बहुत तीर्थ पे ढूंढ्त कभी काशी कभी मदीना। बहुत ढूंढ्त से भी ना खोज पात। कैसे मन हो मेरा नगीना। खोज खोज कर अब मैं हारु। माथे पे बहे पसीना। कोई बाह पकड़ मोहे राह दिखावे। कैसे मन हो मेरा नगीना। जंगल में मैं भटकन रहूँ। पर मन ना पहुंचे ज़रीना। अंखियन दिन रात […]