Category Archives: कुंडलियाँ

ड़ेंगू के मित्रो नमन

ड़ेंगू के मित्रो,, ड़ेंगू पर सब तमकते, कुकृत्य सभी छिपाय । धुंआ पहले कब किये , कोई आज बताय ।। कोई आज बताय , नोकर चाकर है कहाँ । झाड़ू कौन लगाय ,जो घर सफाई करते । पाले दुश्मन आप,कूलर देखिये पंगू। पलते पानी साफ़ , मच्छर लारवा ड़ेंगू।। नवीन,,,

विरह 2

*विरह* 2 अस्त व्यस्त वे टहलते , दीखते शिकन भाल । बुद बुदाहट लब करते, घिसने लगते गाल ।। घिसने लगते गाल ,तन बदन वसन भूलते , नैन हो रहे लाल , विचलित मन भटक चलते ।। मन में लिये सवाल , होचले चाल पस्त। पथ पथिक राह भटकते ,जीवन सूरज अस्त।। *नवीनकुमार तिवारी,,*

प्रेरणा भारतीय

*प्रेरणा* देते उत्सव प्रेरणा, रहे एकता भाव । लेते समान चेतना, पड़े समता प्रभाव ।। पड़े समता प्रभाव , कहते हम एक जुटता ।। देश प्रेमी स्वभाव , जय हिंद बोल एकता।। नाना है परिधान ,सभी भारतीय कहते । भारत रहे महान , ,नारे सुनाई देते ।। *नवीन कुमार तिवारी,,*

सात जन्म

  नवीन संगीत बजते , सप्त पदी चल संग । डहर तभी मधुर लगते , घर सजते नव रंग।। घर सजते नव रंग , किलकलोल मधु यामिनी ।। बजते चूड़ी संग, नयन मटकती कामिनी ।। सात जन्म वरदान , मारे ये तीर कमान । युगान्तर साथ मान , वही बंधन नवीन ।। नवीन कुमार तिवारी,

ढलती शाम

ढलती शाम घर चलिये , कर चलिये आराम । निशाचर की आहट से , नींद सोते हराम ।। नींद सोते हराम , चोर उचक्के ही दिखे । लूट मार के यार , घूमते झूमते दिखे ।। धर्म कर्म दुःख भान ,काम करिये सुख मिलती । मेहनत कर्म मान ,धाम चल सूरज ढलती।। नवीन कुमार तिवारी

मुस्कान दिजिये

खायें ठोकर हम कभी, मुस्कान भूला आय । जबसे मिले आप तभी , चेहरा खिला जाय। चेहरा खिला जाय , राह भटक झुमते मगन । दर्द उभरते भाय , चूमे भूले गगन । दुर जाने की बात , काली घटाये लाये। खेल चुकी जजबात ,ठोकरे फिरसे खाये ।। नवीन कुमार तिवारी,,

बुलबुला

जीवन पानी बुलबुला, पल अगले फुट जाय । मिलजुल मित्रता कीजिये , रहे अमर कविराय ।। रहे अमर कविराय , मृदुभास जगत मानिये। जग आनन्द बन भाय, जीवन सुखमय जानिये ।। प्रेम प्यार सम भाव ,जग छोड़े निशानी । वैमनस्य तम स्वभाव ,बने तब *जीवन पानी* ।। नवीन कुमार तिवारी

तरुणी मीत

राम जपन की उम्र में,पढ़े प्रेम के गीत साठ वर्ष की उम्र में,चाहे तरुणी मीत ।। चाहे तरुणी मीत हुआ क्या इनको भाई कामुकता का मोह इन्हें किस मोड़ पे लाई ।। कह स्वरा कविराय,करो न अपना पतन प्रेम मोह का त्याग कर लो राम जपन ।। स्वराक्षी स्वरा

रामचरित का पाठ

मानव जो करता सदा,रामचरित का पाठ फिर नही यमराज उसे,लाठी मारे साठ ।। लाठी मारे साठ, नही हो यम का फेरा धरती से जब जाय, स्वर्ग ही बने बसेरा ।। बात स्वरा की मान ,बनो मत गर्वित दानव रामचरित का ध्यान,लगाकर बन जा मानव ।।

अंधेरा

*अँधेरा , तीरगी, तम* बन चली काल कोठरी , अंधों का ये राज । मोहक जाल फेंक चले , कैसे शातिर बाज ।। कैसे शातिर बाज , आग लगा प्रकाश किये। काने तीरंदाज, मृगया आखेटन किये ।। सत्ता धुरी सरताज,कुटिल चाल सजाय गली । अंधेरा कर राज ,खंदक देखो बन चली । नवीन कुमार तिवारी,

मृग तृष्णा

मोहक जाल मृगा तृष्णा,कर जाता लाचार । आरक्षण किये बिफरते, समानता अतिभार ।। समानता अतिभार ,मुफ्त लड्डू फेंकते चले । करे जाति व्यापार , सत्ता सुख लग रहे भले ।। विशेष पर अधिकार ,बनते वे देश तोड़क। मोहक ये व्यभिचार ,अंध भक्ति लगे मोहक ।। नवीन कुमार तिवारी,,

कलम धार

कलम धार,, सिक्का जोर से उछलिये, उनका चरितर देख । कागज दिल उकेर चले, हो रहे देख रेख ।। हो रहे देख रेख, बहे देख साहित्य सुधा । उतारते उर लेख, मिटाते कभी उर छुधा ।। दिखा अब कलम धार ,बदल जाये लेख लिखा । चमक दिखा इक बार ,चल जाये खोटा सिक्का ।। नवीन […]

कवि की कविता

परि कल्पना सोच रहे,सृजन करे उर द्वार। माता शारदे वर दे, कलम नही व्यापार।। कलम नहीं व्यापार, निज लाभ मजबूर करे। सत्य ज्ञान संसार,मन भाव मजबूत करे ।। उत्तुंग शिखर अपार , सम्मानित सत्य बोलना । कुटिल नीति पर वार ,कटु लगते परि कल्पना ।। *नवीन कुमार तिवारी*,

स्त्री की कामना

अल्हड़ दिखती नव युवती, करे सोम उपवास। शिव शंकर से पति मिले, रहे कहाँ तब सास ।। रहे कहाँ तब सास , ननद की करे कामना । सोच भरे ये आस ,देगी कौन उलाहना । खेले कैसे रास , मौन रहे ये कामना । मिलेगा सद विश्वास ,नवीनता अल्हड़ दिखती ।। नवीन कुमार तिवारी,,

साधना

*साधना* राम किशन आराधना , उर मन बसते मान । नर नारी कर साधना, होरहे सब महान ।। हो रहे सब महान , ज्ञान वान बन सोचिये । देत तपोबल ज्ञान ,परलोक ही सुधारिये ।। मातृ भक्ति है शान, करते सेवा संतान ।। कर सेवा जनमान,रहते तभी राम किशन ।। नवीन कुमार तिवारी,,

ज्ञान प्रदायिनी

शिक्षा ज्ञान प्रदायिनी , सरस्वती हे मात | बुद्धिहीन खल पर करो , विद्या की बरसात || विद्या की बरसात , कीजिये कुछ बन पाऊँ | विविध छंद मैं सीख ,जगत में नाम कमाऊँ || कह ‘तुरंत ‘ कविराय , मांगनी पड़े न भिक्षा | मुझको दें वरदान , ग्रहण कर लूँ कुछ शिक्षा || […]

गरीबी

ममता व गरीबी ममता के मोल बिकते, गरीब ये संसार। गरीब आंसू पोछिये ,कौन बने भरतार ।। कौन बने भरतार, देख आनन्दित रहिये ।। रखते सेवा दार ,सेवा करते देखिये ।। मस्ती करते अपार,गरीबी में समता। माता खोजे द्वार , बिकते कहाँ ममता ।। नवीन कुमार तिवारी