Category Archives: गीतिका (संदेशात्मक)

दर्द वक़्त के साथ बह जाएगा

वो कवि है,जरा गौर से सुनना बातों-बातों में सब कह जाएगा कहीं भी रहो ,औकात में रहना इज़्ज़त-दौलत यही रह जाएगा हो कुछ भी ज़ुबान साफ रखना दर्द वक़्त के साथ बह जाएगा इंसानों को इंसानों से मिलने देना तो नफरत का बाज़ार ढ़ह जाएगा बच्चों के जज़्बों में हिम्मत रखना फिर देखें ज़ुल्म कैसे सह […]

लोग सह पाते नहीं हैं

लोग सह पाते नहीं हैं ——————- लोग सह पाते नहीं हैं दूसरों का प्यार । है इसी से नफरतों का हो रहा विस्तार ।। दूर तक खामोशियों का गूंजता संगीत खेलने से पूर्व ही सब मान लेते हार ।। राह पथरीली बहुत है टीसते हैं घाव क्या इसी से बैठ रहना हो गया स्वीकार ।। […]

डगर जिंदगी की

डगर जिंदगी की सरल बन गयी । है मुश्किल स्वयं आज हल बन गयी ।। दिया हम ने प्याला था पीयूष का सुधा बूँद थी क्यो गरल बन गयी ।। जो ईमानदारी का भरता था दम कुटी कैसे उस की महल बन गयी ।। झरोखे सभी बन्द अब खुल गये नयी रौशनी की पहल बन […]

पुष्प मधुरितु में कभी खिलते नहीं हैं

गीतिका ———– हार कर जो राह पर चलते नहीं हैं । काफ़िले में वो टिके रहते नहीं हैं ।। छोड़ देती है नदी पीछे उन्हीं को जो लहर के साथ में बहते नहीं हैं ।। है घुटन उन का गला ही घोंट देती पीर जो दिल की कभी कहते नहीं हैं ।। कौन उनके साथ […]

शस्त्र उठालो अब तो नारी

रक्षा खातिर शस्त्र उठालो अब तो नारी रक्षा करने न आयेंगे अब गिरिधारी रावण होते तो धरती पर आ भी जाते लेकिन गली गली अब दुःशाशन क्यारी कंश हुये हर गली गली माना ये लेकिन अबला थी तू अब तो है ये बात पुरानी रणचंडी बनकर अब तो तू शस्त्र उठाले शाप न दे वध […]

जरा सीख लो

गीतिका ———— जरा सीख लो साँवरे प्यार करना । जो’ रूठे हुए उनकी’ मनुहार करना ।। समझते स्वयं को बड़ा ही खिलाड़ी न सीखा मगर सामने वार करना ।। लड़ा सत असत से रहे देखते तुम न चाहा कभी हाथ तलवार करना ।। मिली चार दिन के लिये ज़िन्दगानी इसे व्यर्थ ही अब न बेकार […]

नववर्ष

काव्य सृजन १७६ विषय नव वर्ष तिथि १८.३.१८ वार रविवार लो फिर आ गया नववर्ष मुस्कराता हुआ, मंगलमय सुखद सुन्दर प्रीत बरसाता हुआ। सफलता कदम छूएं न कोई हो गिला शिकवा, उम्मीदों से पूर्ण हो और हमें आगे बढाता हुआ। द्वेष घृणा को त्याग प्यार की होली खेलें….., जीवन में मिले खुशियां,जश्न मनाता हुआ। खिले […]

माँ की दुआ

रोग जाता ही नहीं कितनी दवा ली हमने | माँ के क़दमों में झुके और दुआ ली हमने | इस ज़माने ने सताया भी बहुत है मुझको | आग ये सीने की अश्कों से बुझा ली हमने | जब नजर आई नहीं ख्वाब में ‘ माँ की सूरत | अपनी आंखों से हर इक नींद […]

आधुनिकता

पुराने जमाने से है आधुनिकता भली खिल रही है सहज यहाँ कोमल कली मधुपान अब नही रहा व्यंग का विषय झूम रही मादकता में आज हर गली चल रही आज नारी की पुरुषों पर देखो बोले मीठे बोल,घोलें मिश्री की डली। कम कपड़े और बातें ज्यादा यही बचा आज का नारा,फुले किशोरावस्था नवफ़ली भूल गया […]

चैत प्रतिपदा नव सम्वत्सर

चैत्र प्रतिपदा फिर आई है । धरा फूली नही समाई है । झूम उठीं फसलें सब , अमियाँ भी बौराई है । सोर भृमण पूर्ण फिर वसुंधरा कर आई है । घटती उम्रों के सँग , तरुणाई ली अँगड़ाई है । आर्यवर्त की समृद्ध परंपरा , याद आज हमे फिर आई है । …. विवेक […]

चाँदनी हैं बेटियां

गीतिका शान भारत की रही हैैं बेटियां। लाज घर की आज भी है बेटियां।। कोख में ही मार देते क्यों उसे। फूल सी नाजुक कली हैं बेटियां।। दाँत खट्टे दुश्मनों का कर रही। सरहदों पर जा लड़ी हैं बेटियां।। देख नतमस्तक हुआ सारा जहां। काम ऐसा कर रही हैैं बेटियां।। धन के लालच में जला […]