Category Archives: गीतिका (अन्य)

ढलता सूरज

ढल रहा है क्षितिज तले भानु शिथिल होकर, हो रही अलंकृत सांझ, कुछ सुरमई सी होकर। बाट जोहती सिंदूरी संध्या फैली गगन में, पी से मिलन की है सहेजे नव चाह मन में। दिन में दिनकर नहीं मम, हैं हर प्राणी हेतु, सबके लिए हैं बांधते रवि ऊर्जस्वित सेतु। शर्म की लालिमा से हुई जाती […]

“मेरी माँ”…

°°° ज़िंदगी की ऊँची उड़ान में उजाला है मेरी माँ । दुखों को हर लेती , अमृत का प्याला है मेरी माँ ।। . दिन-ब-दिन खिलता रहा मैं तेरी ममता की छाँव में , तूने ही चलने की मजबूती दी मेरे पाँव में । अथक परिश्रम-गाथा , हाथों का छाला है मेरी माँ , दुखों […]

क्रांति चलनी चाहिए।

रो रहा है देश मेरा आँसू पोछनी चाहिए देश के अंदर फिर से क्रांति चलनी चाहिए। चारो तरफ लूट मार है और हंगामा बरपने लगी भ्रष्टाचारी के खिलाप एक युद्ध चलनी चाहिए। देश के अंदर फिर से क्रांति की लहर दौड़ने लगी शोषण के विरुद्ध फिर से क्रांति चलनी चाहिए। नेता सब भूल जाते आते […]

बिरयानी

पसंद है मुझको तुम्हारी वो हसीन रंगत कि तुम महको और मुझे खुशबुओं में भर दो याद रहती है हर लम्हा मुझे सूरत तुम्हारी कि अपने दीदार से मेरे ख्वाबों को पूरा कर दो याद है वो ज़रदई रंग में लिपटना तुम्हारा कि तुम उस तरह अब मुझको भी रंगों से भर दो जलता हूँ […]

इक शख़्स

होकर दूर हमसे, वो महलों में सज रहा है इक मोती जो समंदर से निकाला था हमने करके अँधेरा यहाँ, वो वहाँ चमक रहा है इक तारा जो आसमान से उतारा था हमने बनाकर दूरियाँ वो, वहाँ खुश्बू बिखेर रहा है इक फूल जो अपने बाग़ में उगाया था हमने उजड़ कर भी वो, देखो […]

जग लगता पागलखाना है

जिनको अपने नेह से साथी मिलने जाना है उनको तो सारा जग लगता पागलखाना है अक्सर पागल सा वो लड़का हँसता रहता है लगता है उसकी आँखो का दर्द पुराना है चाहता के जग धोखा खाकर ऐसा लगता है हर कोई मुझको दुनियाँ में लगे सयाना है पग पग पर ईश्वर ने जग में पर्दे […]

गैरों की ख़ातिर अक्सर हमने

काटेंगा वो क्या फसल प्यार की । बीज नफ़रत का जिसने बोया है । गैरों की ख़ातिर अक्सर हमने, अपनो को ही तो खोया है । बिलिदानों की बलि बेदी पर , बस लाल माँ ने ही खोया है । थामे लाठी कौन नही सहारा , बूढ़ा बाप सोच सोच रोया है । प्रहरी जागता […]

कलम

मेरे दिल के अल्फाजों को कलम लिखती चली गई, जैसा मेरे लफ़्ज़ों ने चाहा वैसे ही ढलती चली गई। कभी खुशियॉ कभी ग़म की दास्तां लिखते लिखते, अपने वजूद को भूल मुझमें ही समाती चली गई। ज्ञ लबों से जो नहीं कह पाई मोहब्बत की बातें…, ज़ज्बातों में खो शब्द उकेरते हुए मुझे भिगाती चली […]

बंद सांसें

पूछा जो किसी ने हाल उनका मैने इस सवाल पर बंद आंखे कर ली बैठा रह गया वो चांद भी तन्हा मैंने इक सितारे से सब बातें कर ली वो कहीं लौट न जाएं मेरे दर से तब से मैंने जागती अपनी रातें कर ली रहा न उन्हें लगाव ज़िन्दगी से मेरी इसलिए मैंने बंद […]