Category Archives: नवगीत

जीवन, समाज और देश

1) घर की मुर्गी तो दाल बराबर, करती नहीं अब कुकड़ू कू। बाबाओं के फेर में पड़कर, जीवन, समाज, देश डूबा क्यूँ। जीवन खेल, बिन इंजन रेल सा,फिर भी करता छुक छुक कू। अंधविश्वास-अंधश्रद्धा में पड़कर,सहपरिवार मनु लटका क्यूँ। नूतन पीढ़ी का हाल न पूछो, चिल-पिल करती है हर ज़ू। अच्छे भले देश को बिठाया, […]

वर्षा

उमड़ उमड़ रहे घुमड़ घुमड़, घन बरसाने को वर्षा घरड़ घरड़ सुन गरज गरज, प्यासी धरा उर हर्षा। छम छम बूंदें बाज रहीं, थिरके प्रकृति अलबेली। श्रावण माह में पड़ गये झूले, सखियां करें अठखेली। हुलस हुलस कर कुहके कोयल, मधुर शहद सी उसकी बोली। आ हाथ पकड़ बरसात में भीगें, हम तुम सजना हमजोली। […]

आवाहन -आल्हा/वीर छंद

वेद ऋचाएँ नैतिकता को , मानव करें सभी स्वीकार। ताकि धरा अम्बर तक महके, खुशियाँ चहकें कर मनुहार।। गहन तिमिर को चीर मही पर, तेज – पुंज से हो साकार। दुख की परछायी हरने को, सबको देने आया प्यार।। किन्तु ध्वंस में जीवन ढूँढ़े , मूढ़ मनुज मन रहे विचार। पग – पग पर बाधा […]

आगमन

प्रकृति रंग बदल रही उष्णता के रूप में छाँव अच्छी लगने लगी अपने हर स्वरूप में परिपक्वता की दहलीज पर खड़ी फसलें उगते सूरज सी हो गईं है सुनहरी नव वर्ष संग आगमन माँ का “माँ” का रूप है मनोहरी….. “जय माता दी”

छिपता चंदा जाती रात

चाँद का चेहरा नदिया देखे सोचे साजन हैं उस पार साजन चंदा का चंचल मन देखे नदिया का सिंगार मोहित चाँद प्रिया नदिया पर करता स्नेह चाँदनी वार बरसाता मधुरस नदिया पर नदिया करती प्रेम विहार उजला रूप दमकता आँचल नदिया नारी का आभास मेघदूत ले जाता पाती साजन आ जाओ इस बार दूर गगन […]

बात करती हैं शिलाएँ

बात करती हैं शिलाएँ पेड़, पर्वत और नदियाँ, हैं सभी की निज व्यथाएँ. राम आयेंगे कहो कब ? बात करती हैं शिलाएँ. मेड़ छोटी हो गयी है, खिंच रही दीवार घर में. खाट बापू की खड़ी है, माँ दिखे लाचार घर में. शाख पीपल की कटी, मुरझा गयीं कोमल लताएँ. है पहुँच से दूर मंजिल, […]