Category Archives: मुक्तक (संदेशात्मक)

“ख़्वाहिश”…

°°° और पाने की ख़्वाहिश इंसान का स्वभाव है , सोच पर हमेशा लालच का दिखता प्रभाव है । मगर कुछ लोगों के चेहरे पे होती है मुस्कान , चाहे जीवन में होता कितना ही अभाव है ।। . हर संतोषी से ग़म बहुत ही दूर रहता है , संतोष से सबका व्यक्तित्व अलग निखरता […]

प्यार का पैगाम-ईद

सबको देते चलो खुशियों का पैगाम रब देता हैं ईद में मोहब्बत का ईनाम अमन चैन हम आपस में बाँटते चले दे सबको ही हम भाईचारा का पैगाम -आकिब जावेद

पैसा / दौलत ; ईश्वर / ख़ुदा ; इंसान/आदमी

छंदबद्ध काव्य सृजन प्रदत्त शब्द: पैसा / दौलत ; ईश्वर / ख़ुदा ; इंसान/आदमी ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ धन-दौलत आजकल बना धर्म ईमान इंसान, जाति भेद संग्राम में क्यूँ बना मनुज हैवान। सद कर्म ही पूजा सुनो कह गये पुरुष महान, आडंबर पाखंड लिप्त तू भूला खुदा भगवान । –––-   नीलम शर्मा….✍

इताब-क्रोध

नीम हकीम परास्त हुए, सुन आगे इताब । क्रोधी और लड़ाकु का मिल जाता ख़िताब। मन ही मन आक्रोश बढ़े,बढ़े संग उत्पात, दिलों में कड़वाहट का मिले नहीं हिसाब। . ✍ नीलम शर्मा

नुकीला

डाल-डाल पर कौवे बैठे,पात-पात पर कीडे हैं। बगिया कैसे महकेगी अब,माली नशे में डूबे हैं। भवरों की जामात खडी है,फूल का रस ले लेने को, फूल बेचारा फसा हुआ है,काँटे बड़े नुकीले हैं।। नाम-कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

मेरे सिंद्धान्त मेरी सच्चाई

किरदार गुम हुए अब वस्त्र नाचते हैं हर ओर भले सीरत हो कौए सी दिखते सभी सुंदर मोर ईमानदार वह जो एकांत जंगल में भी ईमानदारी बरते ना कि समाज के डर से शुद्ध वचन और आत्मा हो चोर **** युवराज अमित प्रताप 77 Registered Copyright N.-1179/92

मतलब

वो चबूतरा गाँव का अब सूना रहता है कहाँ गए सभी हर राहगीर से कहता है जिंदगी जो पढ़कर आया था शहर से अब मतलब यहाँ भी क्या हर घर में रहता है वंदना सिंह धाभाई

कुछ मुक्तक

मुक्तक ——— कहीं मिलती नही मंज़िल कहाँ जाऊँ नहीं दिखता मुझे साहिल कहाँ जाऊँ । उधर खींचे मुहब्बत औ इधर दुनियाँ लिए टूटा हुआ ये दिल कहाँ जाऊँ ।। कठपुतली सा रहे नचाती हमें नियति हर पल नही जानते कहाँ मिलेगा भोजन घर या जल । माया ममता रहें खींचते सदा जगत की ओर आत्म […]

वंदना की वंदना

है सदियों से हाथों में चाँद मेरे फिर भी धरती पर रहते पांव मेरे है अब भी वंदना की वंदना यही ना बनना कभी शहर तू , ओ गाँव मेरे Vandna Singh Dhabhai ….. ©️ .. ®️ ….

इच्छाशक्ति

“नदी जब किनारा छोड़ देती हैं; राह की चट्टान तक तोड़ देती हैं; बात अगर चुभ जाती है दिल में; ज़िंदगी के रास्तों को मोड़ देती हैं!”

फ़लसफ़ा बदलो

बदलो मौसम ज़रा फिज़ा बदलो। जिन्दगी का ये फलसफा़ बदलो। पर न छोड़ो हया का ये आँचल, ढ़ंग जीने का ये नया बदलो। —-राजश्री—-

कतरा कतरा जिन्दगी

जिंदगी के साथ चलती जिंदगी। कतरा कतरा खुशियाँ हरती जिंदगी। वक्त सी करवट बदलती है कभी, कभी व्यर्थ का प्रलाप करती जिंदगी। ——-राजश्री——-

भोगा हुआ यथार्थ

न लिखी पंक्तियों का शब्दार्थ है कविता चाय के साथ लें न वह पदार्थ है कविता छन के निकलता हमारे मन के कोने से हमारा भोगा हुआ बस यथार्थ है कविता

” जिन्दगी “

” जिन्दगी ” जिन्दगी रहस्यो से भरी है जिन्दगी कांटो से घिरी है देखो समझो और पहचानो जिन्दगी विश्वासो से हरी है । ——–@जय प्रकाश निराला

रिश्तों की….रस्साकशी

  रिश्तों की अजीब ये रस्साकशी है कहीं है चाहत तो कहीं बेबसी है इन सबसे दिली भावनायें जुड़ी हैं इन सबको निभाना ही बंदगी है…. संध्या अग्रवाल

तहजीब

मुल्क के वास्ते सर अपना कटा कर देखो शम्मा की मिस्ल कभी खुद को जला कर देखो देखनी है तुम्हें तहजीब अगर भारत की उसको शहरो में नहीं गाँव में आकर देखो

महिला दिवस

*विश्व नारी दिवस 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 वो ही वो बस वो ही वो । धर गर्भ धरा सा रचती जो । बीज जहाँ नव अंकुर फूटे , रचती सृष्टि जो नारी है वो । ….. *विवेक दुबे”निश्चल”*@..

कान्हा

भटक न जाऊँ कहीं तुम राह दिखाना कान्हा, मन में बहुत अंधेरा है उजाला फैलाना कान्हा, गलत न हो मुझसे, कभी भी कोई दिल न टूटे, बस इतना सा सच्चा और अच्छा बनाना कान्हा। सखी