Category Archives: मुक्तक (प्रेम)

“पहचान लो तुम”…

°°° सुन , सूफ़ियाना है प्यार मेरा , जान लो तुम , तुम बिन अधूरा संसार मेरा , मान लो तुम । देखना मत मगर अपने दिल से पूछ लेना , क्या बोलता व्यवहार मेरा , पहचान लो तुम ।। . अहसासों का कुछ भार मेरा , सम्हाल लो तुम , ज़ेहन में कुछ ऐतबार […]

धड़कन

विषय शब्द -धड़कन दिनांक-17-11-18 मिरी चाहत तेरे दिल का, सुरीला साज बन जाती। धड़कने भी सुनो हमदम,मधुर आवाज बन जाती। निगाहों ने निगाहों से इशारों में जो की बातें दीवानों की मोहब्बत का,अलग अंदाज बन जाती। बेचैन दिल की धड़कन,सुन हवाएं बेचैन हैं, न सकुन दिन में हासिल रातों को भी न चैन हैं। पथराई […]

अनुराग

मृदुल मन की लता हिलती है, अनुराग उसमें है। विरहन विरहा में जो जलती है,, त्याग उसमें है। किसी भी रूप को दूं, कौन सी रंगीन उपमा मैं, सिंदूरी सांझ खिलती है,अमिट सुहाग उसमें है। @@@@@@@@@@@@@@@@@@ हवा छितरायी सी है, अनुराग उसमें है। सूरज से किरन निकली,बैराग उसमें है। तुम्हारे सौंदर्य की उपमा मैं किसे […]

“यार मेरे”…

°°° सुन लो ज़रा दिल की बात , कुछ कहना है यार मेरे , आखिरी साँस तक तेरे संग रहना है यार मेरे । यक़ीनन मिलेंगे इस ज़िंदगी में कुछ खुशी और कुछ ग़म , मगर हमेशा मुस्कान लेकर बहना है यार मेरे ।। . अहसास जब एक हो जाए तो प्यार है यार मेरे […]

पराग पीने की लालसा का अनुराग उसमें है

अनुराग मृदुल मन की लता हिलती है, अनुराग उसमें है। विरहन विरहा में जो जलती है,, त्याग उसमें है। किसी भी रूप को दूं, कौन सी रंगीन उपमा मैं, सिंदूरी सांझ खिलती है,अमिट सुहाग उसमें है। ★★★★★★★★★★★★ हवा छितरायी सी है, अनुराग उसमें है। सूरज से किरन निकली,बैराग उसमें है। तुम्हारे सौंदर्य की उपमा मैं […]

हमनजर

कभी रात के मसीहा कभी दिन के उजाले हो। जाने किस तरह से मेरी दुनिया को संभाले हो। तुम कुछ भी रहो जहाँ की खातिर मगर। मेरे लिए तो तुम हमनजर दिलवाले हो। ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

नजर

घूरती हुई नजर इकरार सा करती है। ढूँढती हुई नजर इन्तजार सा करती है। ये दरमियाँ दिखे मोहब्बत की इन्तेहाँ है। जो हर नजर को ही बीमार सा करती है । ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

हिदायत

मुक्तक। हिदायत दी हमें उसने,दीवाना बन न जाऊँ मैं। मुहब्बत की हवाओं का,तराना बन न जाऊँ मैं। चली सदियों से रीति जो,उसी का हिस्सा बनकर यूँ, पतंगा बन न जाऊँ मैं, शमा पर जल न जाऊँ मैं।। कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

जला कर प्रेम दीपक

मैं किस्मत आजमाना चाहती हूं। तुझे अपना बनाना चाहती हूं। जलाकर प्रेम का दीपक जहां में, गज़ल एक गुनगुनाना चाहती हूं। ——-राजश्री——

भावनायें…

कभी इठलाती है यारो कभी ये मुस्कुराती हैं। कभी तारीक़ियों में आके ख़्वाबों को जगाती हैं। महकं उठती है उस पल रात को तन्हाइयाँ मेरी ‌, कि सीने में जो भीनी भावनाएँ गुनगुनाती हैं। ——राजश्री——

ये आँखें

ये आँखें आइना दिल का राज सब खोल देती हैं। छुपा लो चाहे तुम जितना ये आँखें बोल देती हैं। गुजर जाते हो जब भी पास से चुपचाप तुम मेरे, ज़ुबां खामोश हो बेशक नजर सब बोल देती हैं। —-राजश्री—-