Category Archives: मुक्तक (प्रेम)

अनुराग

मृदुल मन की लता हिलती है, अनुराग उसमें है। विरहन विरहा में जो जलती है,, त्याग उसमें है। किसी भी रूप को दूं, कौन सी रंगीन उपमा मैं, सिंदूरी सांझ खिलती है,अमिट सुहाग उसमें है। @@@@@@@@@@@@@@@@@@ हवा छितरायी सी है, अनुराग उसमें है। सूरज से किरन निकली,बैराग उसमें है। तुम्हारे सौंदर्य की उपमा मैं किसे […]

“यार मेरे”…

°°° सुन लो ज़रा दिल की बात , कुछ कहना है यार मेरे , आखिरी साँस तक तेरे संग रहना है यार मेरे । यक़ीनन मिलेंगे इस ज़िंदगी में कुछ खुशी और कुछ ग़म , मगर हमेशा मुस्कान लेकर बहना है यार मेरे ।। . अहसास जब एक हो जाए तो प्यार है यार मेरे […]

पराग पीने की लालसा का अनुराग उसमें है

अनुराग मृदुल मन की लता हिलती है, अनुराग उसमें है। विरहन विरहा में जो जलती है,, त्याग उसमें है। किसी भी रूप को दूं, कौन सी रंगीन उपमा मैं, सिंदूरी सांझ खिलती है,अमिट सुहाग उसमें है। ★★★★★★★★★★★★ हवा छितरायी सी है, अनुराग उसमें है। सूरज से किरन निकली,बैराग उसमें है। तुम्हारे सौंदर्य की उपमा मैं […]

हमनजर

कभी रात के मसीहा कभी दिन के उजाले हो। जाने किस तरह से मेरी दुनिया को संभाले हो। तुम कुछ भी रहो जहाँ की खातिर मगर। मेरे लिए तो तुम हमनजर दिलवाले हो। ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

नजर

घूरती हुई नजर इकरार सा करती है। ढूँढती हुई नजर इन्तजार सा करती है। ये दरमियाँ दिखे मोहब्बत की इन्तेहाँ है। जो हर नजर को ही बीमार सा करती है । ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

हिदायत

मुक्तक। हिदायत दी हमें उसने,दीवाना बन न जाऊँ मैं। मुहब्बत की हवाओं का,तराना बन न जाऊँ मैं। चली सदियों से रीति जो,उसी का हिस्सा बनकर यूँ, पतंगा बन न जाऊँ मैं, शमा पर जल न जाऊँ मैं।। कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

जला कर प्रेम दीपक

मैं किस्मत आजमाना चाहती हूं। तुझे अपना बनाना चाहती हूं। जलाकर प्रेम का दीपक जहां में, गज़ल एक गुनगुनाना चाहती हूं। ——-राजश्री——

भावनायें…

कभी इठलाती है यारो कभी ये मुस्कुराती हैं। कभी तारीक़ियों में आके ख़्वाबों को जगाती हैं। महकं उठती है उस पल रात को तन्हाइयाँ मेरी ‌, कि सीने में जो भीनी भावनाएँ गुनगुनाती हैं। ——राजश्री——

ये आँखें

ये आँखें आइना दिल का राज सब खोल देती हैं। छुपा लो चाहे तुम जितना ये आँखें बोल देती हैं। गुजर जाते हो जब भी पास से चुपचाप तुम मेरे, ज़ुबां खामोश हो बेशक नजर सब बोल देती हैं। —-राजश्री—-