Category Archives: क़ता (संदेशात्मक)

मुहब्बत आज की

उसकी याद मुझमें आज भी साँसे घोलती है बातें करूँ तो उसकी तसवीर आज भी मुहब्बत बोलती है उसके हो गए थे हम आँखों से ही मुस्कुराते बोल पर जाने क्यों दुनिया आज मुहब्बत से पहले महबूब तोलती है ****** Registered Co.Ryt.-N-1036/93 ***** Yuvraj Amit Pratap 77

ज़हर पीकर मौत को ठगते हैं

नहीं मलनी अब पलकें, सपनों की भी एक हद होती है भूल जाता धड़कते में दिल,दिल की भी सरहद होती है आओ ज़हर पीकर थोड़ा, अब मौत को ठगते हैं लोगों के मरने की वज़ह तो आजकल शहद होती है ******* Registered Copyright-N-1098/63 युवराज अमित प्रताप 77

चेहरे पे चेहरा

रोज नया चेहरा बनाता हूँ ,कुम्हार की तरह। फिर चेहरे पे चेहरा लगाता हूँ ,कलाकार की तरह। और आइने से नजरें चुराता हूँ ,गुनहगार की तरह। कभी बाजार में बिक जाता हूँ ,व्यापार की तरह। किसी अजनबी को गुहार लगाता हूँ, दिलदार की तरह। मेरे चेहरे से चेहरा उतारो मददगार की तरह।

“नहीं कोई मलाल रहे”…

°°° ज़िंदगी एक ज़ंग है तेवर को अभी बरक़रार रखो , मुश्किलों का समाधान बस दो पल में नज़र आयेगा । जो हारता है वो बाद में अंततः जीतता भी है , ज़ख़्म मिलेगा तो  वो भी धीरे-धीरे भर जायेगा ।। •• पल-पल ज़िंदगी में साँसों की कीमत समझ तो लो यार , हरेक ख़्वाहिश […]

नादान

ए उम्र अब कहाँ ले जाएगी तू मुझको क्या बचपन, सारी जवानी जब दे दी तुझको वक्त की निगहबानी देख नहीं मैं उड़ना छोड़ दूँगी मेरा दिल है बताता नादान अभी तलक मुझको ★वन्दना सिंह धाभाई★ ©

सरहद उम्मीद की

बेशक मेरे ख्वाबों पर ये दुनिया हंसती है पर उम्मीदों की सरहद में तो दुनिया ही बसती है ख्वाबों के खूबसूरत होने की यही तो कहानी है हसीन दिखते हैं जबतक, निगाह पाने को तरसती है ★ वंदना सिंह धाभाई ★ ©

नहीं कोई तुम्हारा , तुम्हारा होकर

वक्त ने ज़िन्दगी के पत्ते कुछ यूँ बांटे मेरे हिस्से सारे जोकर आ गए कहीं भी उन्हें आजमाने खुशी से चला जब मैं बस उसी पल वो चेहरे धोकर आ गए –––––– संदेशात्मक शायरी – .कता ************ Yuvraj Amit Pratap 77 Registered Copyright-N-78/93

आलीशान कफ़स में मुर्दा जिंदगी

रात कब रुकी है जो आज रुक जाएगी सुबह आने से पहले चली कल जाएगी पलकों पर नज़र आ रहा ताजमहल ख्वाबों का सभी के आँख खुलते ही जिंदगी फिर मकबरे में बदल जाएगी ***** युवराज अमित प्रताप 77 Registered Copyright-N-382/34

ज़हर बेचते हैं

क़ज़ा बेचते हैं क़हर बेचते हैं सरेआम, शाम -ओ -सहर बेचते है जो दौलत को अपना ख़ुदा मानते हैं दवा के वरक़ में ज़हर बेचते हैं भरत दीप

जबसे लगा मैँ लिखने ,दर्द हमदर्द लगा दिखने

कलम से दर्द का रिश्ता सबसे करीबी कहलाता है दर्द कलम को वह बताता जो सबसे छिपाता है खुशी दिखाने को तो बड़े बड़े जश्न हैं मनते मौजूद हो कर भी महफ़िल में दर्द सामने नहीं आता है खुशी में डूब इंसान खुद ही झूमता गाता है क्या खुशी का बिना लिखे नज़र नहीं आता […]

इस जमाने में घर बनाने में

जमीनें आसमां छूने लगी हैं इस जमाने में | पसीना छूट जाता है यहाँ इक घर बनाने में | रखी है आश जिनसे वो फकत मशगूल रहते हैं, कभी मन्दिर बनाने में कभी मसजिद गिराने में | 2 रूह रोती न दर्द ही होता| मेरा कातिल जो अजनबी होता| सब्र होता ये कत्ल होकर भी, […]

गम बांटने से तकलीफें कम हो जाती

जिंदगी की सारी शिकायतें ख़त्म हो जाती हैं ये वही मोड़ है जहाँ उम्मीदें ख़त्म हो जाती हैं फुरसत में कभी सुनना तुम दर्दे दिल हमारा भी सुना है गम बांटने से तकलीफें कम हो जाती हैं कुछ बात और अधूरा प्यार छुपा रखा है बीते कल का यूँ ही नही मुस्कुराते चेहरों की आंखें […]

यादें साथ उम्रभर का

ठहर चुके लम्हों से सवाल किया जाता नहीं है मालूम शाम का परिंदा मुड़कर आता नहीं यादों के शहर ने बनाया हम में आशियाँ अपना कोई बाशिंदा अपना घर छोड़ तो जाता नहीं ★वन्दना ★ …. ©️

जल जाओगे

सूरते मोम किसी रोज पिघल जाओगे इस तरह आग से खेलोगे तो जल जाओगे मान्ता हूँ कि मिरी जात है इक शम्मा-ए- हकीर तुम भी सूरज हो मगर शाम को ढल जाओगे

तलब

दौलत की तलब और ना हुकूमत की तलब है दुनिया से मुझे सिर्फ मुहब्बत की तलब है सूरत तो हजारों हैँ हसीं साद जहां में सूरत की नहीं मुझको तो सीरत की तलब है अरशद साद

दिसंबर पे जून भारी था

  वह शाम हिज्र थी उस पर जुनून तारी था ब शक्ले अश्क इन आँखों से खून जारी था हमारे शहर का मौसम बदल गया कितना कि अब के साल दिसम्बर पे जून भारी था अरशद साद रूदौलवी

रहनुमा कब तक बनोगे

रहनुमा कब तक बनोगे तुम हमारी जी़स्त के, छोड़ दो तन्हा कि खुद को आजमा कर देख लें। दाव पर ही जब लगा दी हमने अपनी जिन्दगी, आज तूफानों में अपना घर बना कर देख लें। —-राजश्री—–

कालीन

कितना कुछ आसान बनाकर रक्खा है जाने क्यों तूफान उठाकर रक्खा है इससे बेहतर और सियासत क्या देगी काँटों पर कालीन बिछाकर रक्खा है शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

सियासत

काग़ज़ का भी गुल महकाना पड़ता है। बिल्कुल जादूगर बन जाना पड़ता है। यार सियासत अपने बस का रोग नहीं आंखें छीन के ख़्वाब दिखाना पड़ता है।। शाहिद मिर्ज़ा शाहिद