Category Archives: क़ता (दर्द)

खंजर का रोना

कभी तो जहां का कभी घर का रोना कभी रोये इंसां मुक़द्दर का रोना कभी दोस्तो की शिकायत जहां से कभी पीठ में यार ख़ंजर का रोना..

दिल ही तो है

ज़िंदगी दिखा कर ज़िंदगी ही मोड़ देते हैं ले जाते हैं हाथ थाम , बीच राह में छोड़ देते हैं नहीं तोड़ते जहाँ लोग नींद तक अपनी मासूम से दिल को लोग यूँ ही तोड़ देते हैं ***** Registered CopyRight-N-1067/94 ***** Yuvraj Amit Pratap 77 …. दर्द भरी शायरी

और … इश्क़ मर गया

खामोशी ही पसरी रही दोनों के दरमियाँ बेजुबां इश्क़ करहाता रहा , बस एक सदा के लिए लम्हों में लगी थी घुलने आदत , खुद में रह पाने की मोहब्बत समेट लाई अपने निशां, अफसाने में कदा के लिए सदा – आवाज़ कदा – स्थान अफ़साना – कहानी ** Registered Co.Ryt-N-1192 /23 ** युवराज अमित […]

खुद को मार के ही दुनिया नसीब है

मंजिले तो बहुत भटकी हैं बहुत मेरी तलाश में ज़िंदगी ढूंढने में खोया रहा मैं अपनी लाश में मुर्दा बन पा भी लेता दुनिया के तख्तो-ताज देख उसे जो जिंदा ना होता उस पल काश मैं ********** Registered Copyright-N-424/89 ********** Yuvraj Amit Pratap 77 .. दर्द भरी शायरी –    .कता

अंधेरा घना हो रहा है

अंधेरा ये कैसा घना हो रहा है अजब बेबसी का गुमाँ हो रहा है । कई वक़्त बीते थे बनने में जिनके इश्क़ का फसाना फना हो रहा है ।। जिसे देख चेहरे पे खिलती हँसी थी आज मिलते ही मन अनमना हो रहा है ।। स्वराक्षी स्वरा

तिश्नगी

इस दाम ए तिश्नगी में क्यूँ फंस गया है तू इश्फ़ाक़ भी कर ले कभी राह ए मदीन में ज़र और ज़मीन साथ में जाते नहीं कभी सोया है शहंशाह भी दो गज़ ज़मीन में भरत दीप दाम ए तिश्नगी = इच्छाओं का जाल इश्फ़ाक़ = दया, पुण्य राह ए मदीन = ईश्वर का मार्ग […]

सीने में तूफ़ान लिए

तूफान की आमद का तो इमक़ान था उसे फाक़ाकशी से घर को बचाने निकल पड़ा सीने में समेटे हुए बच्चों की ख़्वाहिशें बदक़िस्मती को फिर से हराने निकल पड़ा भरत दीप इमक़ान- अंदेशा,अन्दाज़ा फाक़ाकशी- भुखमरी

दिल बड़ा नादान है, दिमाग से ज़रा अंजान है

कहाँ छिपाऊँ खुद को,जो तेरा गम देख ना सके किसे ओढूं तेरी याद जिसे फिर भेद ना सके हटा बेबसी की बैसाखी गिर भी पडू किसी कांधे पर कहाँ मिलेगा कोई जो मेरे दिल से फिर खेल ना सके ******** Registered Co.Ryt.N-436/97 ******** युवराज अमित प्रताप 77 .. दर्द भरी शायरी – .कता

ढूंढे मज़े बस , पढ़ने में

दर्द रख भी डाले निकाल तू अपना कागज़ पर जमाना चलता है नुक्स निकालने की आदत पर चीर कलेजा तू अपना सभी को पढ़वा देना खून में रंगे शब्द देख उठेंगे हाथ वाह! की कहावत पर ढूंढे हैं सभी ने तो मज़े हैं कि नहीं पढ़ने में कौन किसी शायर को याद करता है शायर […]

मासूमियत चेहरे की

मासूमियत चेहरे की देख फरेबी कहता कौन.. बड़े दिल वालों के दिल में अकेले रहता कौन.. ज़रा ज़रा सी बात पर जो छोड़ जाने को तैयार दूर मंजिल तक साथ सफर में चलता कौन.. “आकर्षण” जिस्म का सीमित है नज़रों तलक रूहानी मोहब्बत को अब ख़ुदा कहता कौन.. ____Akarshan Dubey “अंजान”

जिंदा दिखने को ज़रिया बनाया लिखने को

वक्त काटने का ज़रिया बने हम ज़माने के लिए हैं नहीं हम करते दर्द बयां शायरी हो जाने के लिए हैं देख ले बस कभी वो आकर हाँ वो मोहब्बत ही थी ना हो दफन तबतक अपनी लाश बचाने के लिए हैं ******** Registered CopyRight.-N-477/23 ********* … Yuvraj Amit Pratap 77 ..  दर्द भरी शायरी […]

हर लम्हा अश्क लिए आता है

जिंदगी से जाकर तो कोई इतना तंग नहीं करता कोई ऐसा पल नहीं जो दिल ख्यालों से जंग नहीं करता करें क्या जो हर लम्हा अश्क लिए चीरता चला आता है लहू से होती हैं आँखे लाल, कोई रंग नहीं करता ******** Registered CopyRight.-N.-856/43 ********* … युवराज अमित प्रताप 77 ..  दर्द भरी शायरी – […]

बादे सबा

बादलों का जमघट बातें करता है उस आसमानी तन्हाई की तस्वीर खींची है जहाँ मुझसे उसकी जुदाई की जरा गुजरे बादे सबा मोहब्बत के आगोश से सूरज के सीने में जल उठती है आग उसने जो बेवफाई की युवराज अमित प्रताप 77 Reg.Co.Ryt.- 371/97

अब मिले शाख कोई

क्यों नम मौसम ही मेरे मकान में रहता है उसका ही ख्याल क्यों आसमान में रहता है कभी तो आराम मिले मेरी धड़कनों को भी हर वक्त तो नहीं  परिंदा  उड़ान  में रहता है ******** Registered CopyRight.-N.– 965/2 ********* … युवराज अमित प्रताप 77 ..  दर्द भरी शायरी – .कता

सहन में बिखरी तकदीरें

वक्त के सहन में बिखरी तकदीरें बेबसी के ग़ुबार में साँस लेती तसवीरें रहतीं हैं ख़ुद को छिपाये सिरहन में पहनाते सब उन्हें अपनी पसंद की जंजीरें ©★वन्दना★

ख़ौफ़ यकीन का

यकीन टूटने  सा  बेदर्द  तो ये  दर्द  भी  नहीं होता रिसता फिर बदन ही उसका सिर्फ़ आँख से नहीं रोता डर जाता  दिल इस कदर  धड़कनों  के भी साये से सूरज तो निकलता उसका पर उसमें उजाला नहीं होता ******** Registered CopyRight.-N.– 989/43 ********* … युवराज अमित प्रताप 77 .. दर्द भरी शायरी – .कता

टूटी आस

उमीद टूट गयी जब सजी धजी अपनी तो दिल से चीख़ भी निकली घुटी घुटी अपनी मैं कैसे मान लूँ उसको कि हमसफर है मिरा लकीर हाथ कि जब है मिटी मिटी अपनी अरशद साद रुदौलवी

ढूंढता हूँ

दे पता हुआ बेपता पता ढूंढता हूँ । गुम हुआ कहाँ वो मकां ढूंढता हूँ । था ऐतबार जिस साहिल पर , उस साहिल में वफ़ा ढूंढता हूँ । ….. विवेक दुबे”निश्चल”@..

वो है जो चाँद लेकिन सिर्फ मेरा

वो है जो चाँद लेकिन सिर्फ मेरा है कहीं गुम हैं। मिरे ख्वाबों का वो ही तो लुटेरा है,कहीं गुम है। अंधेरा ही अंधेरा है, गगन मे लाख तारे हों। जो मेरी ज़िन्दगी का ही सवेरा है, कहीं गुम है।। अंशु