Category Archives: क़ता (मोहब्बत)

ज़ुल्फ़ को आदत है

राहे उल्फत में सनम गुल सा निख़र जाने की। आरजू अपनी यही फिर से संवर जाने की। छेड़ती हैं ये कभी रुख़्सार कभी लब जानां, क्या करूँ ज़ुल्फ़ को आदत है बिख़र जाने की। –राजश्री–

कशमकश है…

कशमकश है तुझे इस दिल में बसाऊँ कि नहीं मोम सीने में आफताब छुपाऊँ कि नहीं बाख़ुदा मैं तिरा दीवाना हुआ जाता हूँ है शशो पंज तुझे हाल बताऊँ कि नहीं भरत दीप

मुकाम

सदियों के बाद क्यों ऐसा ये मुकाम आया। क्यों जिन्दगी की बस्ती में कोहराम आया। बर्बाद हो गए हम तेरी मोहब्बत में। तब सुकून आया जब तेरा सलाम आया। ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

इन्तजार

मालूम नही शायद इन्तजार का गम है। मालूम नहीं शायद इन्तजार से हम हैं। मालूम नहीं शायद ये इश्क क्या बला है। मुझमें दिखो तुम, तुममें दिखें हम हैं। ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

साथी है वही चाँद अब भी

खा कर ज़ख्म भी मेरा हौसला तो देख मुस्कुरा तू जो चाँद में दिया रोई मैं भी नही था साथी जो कभी हमारी मोहब्बत का अकेले पड़े चाँद के साथ को सोई मैं भी नहीं ©★वंदना सिंह धाभाई★ ®

एहसास बना देंगे

अपने रिश्तों को खास बनाएंगे दोस्ती में एक इतिहास बनाएंगे दूर भले ही हम रहे,दूर भले ही तुम रहो हम तुम अपनी यादों को एहसास बनाएंगे स्वरा

सिर्फ मरना ही तो है

बेदर्द शोक उनका रो कर भी पूरा करना है मिरा आख़री कतरा भी आँख से ही गिरना है खुश तो हों आँसुओं के गिरते झरने ही देखकर मिरा क्या लिए मोहब्बत मुझे तो सिर्फ़ मरना है ****** Registered CopyRight.-N.– 999/63 ****** ..  युवराज अमित प्रताप 77 .. दर्द भरी शायरी – .कता

तराश कर अक़्स निग़ाह से

कुछ यूँ ताक़ीद किया मुझको , कनीज़ से हूर किया मुझको , तराश कर अक़्स निगाहों से, काँच कोहेनूर किया मुझको , … विवेक दुबे”निश्चल”@..

तुम बिन

एहसासों के यह जो धागे है न जुदा होकर भी हमको बाँधे है न अनंत सी दूरियाँ है हमारे दरमियाँ चाहतें ही तो है जो हमको साधें है न सच तो यह भी है कि मुक़म्मल जहां में तुम बिन हम, हम बिन तुम आधे है न….