Category Archives: नज़्म (अन्य)

चुल्लू भर की बात

नज़्म ताउम्र कोशिशों को मेरी नाकाम कहता हूँ! मैं खुद को शायर, मौजी, बदनाम कहता हूँ! बस खता करता हूँ असलियत बताने की, उसी खता में शामिल ये पैगाम कहता हूँ! यहां मयखानें में छलकते ग्लास टूटे हैं, मैं साकी के नशे को ही जाम कहता हूँ! क्या फायदा किसी कुचखाने में आकर गिरे, ऐसे […]

चुप रहना

दास्तान-ए-ग़म सुना कर चुप रहा अशक आँखों में छिपा कर चुप रहा रोक लेती है मुझे ख़ुददारियां मैं गिला होंटों पे ला कर चुप रहा ज़िंदगी तो चाहती थी रो पड़ूँ पर ग़मों में मुस्कुरा कर चुप रहा ज़ब्त मेरा ज़िंदगी तू देख ले क़ुफ़्ल होंटों पर लगा कर चुप रहा ज़िंदगी करती रही मुझसे […]

रात जागती रहती है

रात दबे पाँव न जाने कहाँ भागती रहती है किसी से कुछ कहती नहीं,जागती रहती है किसी मोड़ पे किसी परछाई की तलाश में आँखें मींच के हर शख्स को ताकती रहती है उजाले की बिल्कुल भी कोई ख्वाहिश नहीं बस हर घड़ी पूनम का चाँद माँगती रहती है नींद की गलियों में क्यों कर […]

बच्चों सा ही मुझे चाहा कर

मेरे दिल में नहीं तो ना सही मेरी निगाहों में तो रहा कर अगर मुस्कान की सूरत नहीं तो आँसू ही बनके बहा कर जरूरी नहीं हर राज़ कहना कभी कुछ यूँ भी कहा कर दवा नहीं मर्ज हर ज़ख़्म की कुछ देर तो दर्द भी सहा कर गर चाहता है मैं भी तुझे चाहूँ […]

उठाओ जो लफ्ज़ तो एहतियात से उठाना

उठाओ जो लफ्ज़ तो एहतियात से उठाना बिगड़ के बनने में फिर ज़माना लगता है किताबें कल कह रही थी मुझसे बारहां तू मुझे अब भी चाहता है,दीवाना लगता है वो हर्फ़ की खुशबू,वो अहसासों की रानाई अपनी धुन में चले तो कोई तराना लगता है बंद कमरे की मद्धम रोशनी में छिपाकर मुझमें खत […]

दावा है कि बुलंदियों तक पहुँचूँगा मैं एक दिन

नींद आती नहीं मुझे रात भर कोई तो वजह है यकीनन कोई तो मुझमें रात भर जागता रहता है मेरे ज़िंदादिल और हसीन होने का यही राज़ है मेरी नसों में कोई तो खूं बनकर भागता रहता है महफूज़ हूँ मैं बिलकुल जैसे कोई मोती सीप में दुआ में रोज़ कोई मुझे खुदा से माँगता […]

अंदाज़-ए-ग़ज़ल

कुछ ज़माने से जुदा है मेरा अंदाज़-ए-ग़ज़ल मैंने   मतलों   में   सवालात   छिपा   रक्खें  हैं मैंने  मिसरों   में   समेटा  है  ज़माने का चलन मेरे   मक़्तों    ने    जवाबात    समा    रक्खे  हैं मैंने    शेरों   में   कही   है   मेरी   आँखों   देखी मैंने   अहसास   ही   अल्फाज़   बना रक्खें  हैं ना   कोई   तंज़   न   फिक़रे   न […]

तबीली ( परिवर्तन)

नज़्म ———- तब्दीली ( परिवर्तन ) ——– पहले के और आज अखबारों में ये तब्दीली है पहले अपराधी को बस अपराधी लिक्खा जाता था नाम के साथ अब अपराधी का मज़हब लिक्खा जाता है । पहले में और आज में अपने अंदर भी तब्दीली है पहले हम तुम इक दूजे के दुख में शामिल रहते […]

नया उनवान

मुझे इक नज़्म कहनी है मगर उनवाँ नहीं मिलता मुहब्बत नाम दूं इस का या फिर हालात पर लिखूँ तुम्हारी बेरुखी लिखूँ या दुनिया-दारी पर लिखूँ मगर फिर सोचता हूँ मैं पुराने हैं सभी उनवाँ सियासत भी कहाँ अब रास आती है ज़माने को कोई दे मश्वरा मुझको हो कैसे इबतिदा उस की किसे उनवाँ […]

#ख्वाइशें

#ख्वाइशे ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~  आज भी उन ख्वाईशो से मैं लिपटकर  सोता हूँ भले आज वो लाशें ही सही  इन ठिठुरती सर्दियों में•••••••  अनजान खामोश बिस्तरों पर जो  कभी स्वप्न थे जीवंत और उसको  पाने की अभिलाषाओं से भरे  कितना वीरान सा सुकूँ भरा  शून्य से चेतना से परे  एक अलग ही दुनिया का आकाश  एक ही […]

खामोशी का गीत

खामोशी का गीत कभी सुना है इस गीत को… जब दिल तन्हा होता है, खामोशी, तराने गा उठती है, कभी दर्द के, कभी हँसी के, कभी अंतहीन सोच के तराने, ख़ामोश हो कर देख, कुदरत की आवाज़ों में, एक संगीत होता है, पत्तियों की सरसराहट, चिड़ियों के गीत , हवा का गुजरना,सरर्रर्रर से चलती। हाँ, […]