Category Archives: नज़्म (संदेशात्मक)

कातिल निगाहों को उठाइए जरा

ये बच्चा सच बहुत बोलता है,यहाँ जी नहीं पाएगा ज़माने के मुताबिक इसे झूठ भी सिखलाइए जरा बेशुमार खुशी बयाँ कर दी सरे-महफिल आपने हर एक खुशी में छिपा दर्द भी दिखलाइए जरा ये सारे नए वायदों की सरकार है मेरे हुज़ूरे-वाला एक बार वोट देके देखिए,फिर मुस्कुराइए जरा कब तक दूसरों के भरोसे इंक़लाब […]

काजल करने के लिए ताज़ा खूँ चाहिए

इन आँखों को नूर नहीं जुनून चाहिए काजल करने के लिए ताज़ा खूँ चाहिए गीत,ग़ज़ल,कविता,नज़्म सब बोलती हैं जिससे हज़रात क़त्ल हो,मजमून चाहिए जिस्म में गर्मी,लबों पे आग,अदाओं में चुभन इन्हें अब दिसम्बर में भी जून चाहिए हलाल करके बन्द ज़ुबानों को जो मिले कातिलों की पसन्द वाला ही शुकूँ चाहिए इन्हें डराकर जीने की […]

महकती ज़िन्दगी में खिलता हुआ दयार दे!

लफ़्ज़ों को अपने धार दे,चरित्र को निखार दे सादगी में जिंदगी गुजार दे, खुशनुमा दयार दे वो कली कली महक उठे,गली गली चहक उठे वो मुल्क में भी अपने चमनो अमन दयार दे हर्फ़ हर्फ़ कुछ कह रहा, अपने कुछ विचार दे गमगीन ज़िन्दगी हुई, अपनी ज़िन्दगी सुधार दे अपनों को भी प्यार दे,सियासत को […]

ये मौत तू जिंदगी के साथ चलती है

**ऐ मौत तू जिंदगी के साथ चलती है** ऐ मौत तू जिंदगी के साथ चलती है हर पल तू मिलन को तैयार रहती है रफ़्तार जिंदगी की चाहे जितनी हो हर कदम तू उसका साथ निभाती है ज्यादा दूर ये सांसे जा नही सकती जीवन की डोर तू हमेशा साधे रहती है जरा सी नादानियां […]

इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

जो देखूँ दूर तलक तो कहीं बियाबाँ , कहीं तूफाँ नज़र आता है इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है इंसानों ने अपनी हैवानियत में आके किसी को भी नहीं बख्शा है कभी ये ज़मीं लहू-लुहान तो कभी घायल आसमाँ नज़र आता है मशीनी सहूलियतों ने ज़िन्दगी की पेचीदगियाँ यूँ बढ़ा […]

गलियों में रोज़ होली, रमज़ान किया करें

जिनको जीना है,वो उनकी आँखों से जाम पिया करें और इसी तरह अपने जीने का सामान किया करें खुदा किसी के मकाँ का शौकीन तो नहीं रहा तो दिल में ही कभी आरती तो कभी आज़ान किया करें हमेशा दूसरों की नज़र में ही अहमियत जरूरी है क्या कभी तो खुद को भी खुद का […]

ये दौरे-इम्तहान है,बस खुदा का नाम लो

ये दौरे-इम्तहान है,बस खुदा का नाम लो ऐसे वक्त में तो काज़ी,नज़ाकत से काम लो क्या सोचा तुम्हारे कर्मों का हिसाब नहीं होगा अब अपनी सफाई के सारे साज़ो-सामान लो ये तमाम रियासतें धरी की धरी ही रह जाएँगीं अपने गुनाहों की माफी अब सुबहो-शाम लो जिस्म सारा दुहरा जा चुका बेदिल कामों में अब […]

इस हसीन शहर में बसिए ज़रा

क़त्ल कीजिए और हँसिए ज़रा इस हसीन शहर में बसिए ज़रा बाँहों में कैद दरिया तो घुट गया अब दो बूँद पानी को तरसिए ज़रा बेवक़्त बरसात होके दूजों तबाह किया कभी अपने आँगन में भी बरसिए ज़रा सुना बहुत ख़ौफ़ में ज़माने में आपका फिर तबियत से खुद पे भी गरजिए ज़रा सब काम […]

नारी जात पर अत्याचार

नज़्म प्राचीन सभ्यता का मरण हो रहा है! महफूज न कोई अब शरण हो रहा है! शुरू हो गया महाभारत का दौर देखो, हर जगह द्रौपदी चीरहरण हो रहा है! न गाँव में, शहर में, बाहर, न घर में, हवस में शामिल समस्त आवरण हो रहा है! बेख़ौफ दरिंदे खुलेआम घूमते है, मासूम बच्चीयों का […]

मतलब की बात

चलो आज तुम्हारे मतलब की बात करते हैं बेवजह चौक-चौराहे पर जात-पात करते हैं दिन की शक़्ल पर एसिड डाल दिया है अब थोड़ा खून सा लथपथ ये रात करते हैं किसी को हिन्दू तो किसी को मुस्लिम बनाकर सरेआम क़त्ल इंसानों के जज़्बात करते है मज़लूम अपने हक़ की रशीद न माँग बैठे तंत्र […]

गज़ब ढ़ाने का उसका सिलसिला पुराना है

दफ़अतन तुम्हीं आए हो महफ़िल में देर से वर्ना गज़ब ढ़ाने का उसका सिलसिला पुराना है कभी किसी की सूरत पे भी मर-मिट सकते थे हम वो दौर ही कुछ और था ये अलग ही ज़माना है जड़ जब से काट दिया गया शज़र के बदन से फिर अब अपना वजूद भी किसको दिखाना है […]

वो भी अब ग़ालिब की औकात पूछते हैं

जिन्हें कोई समझ नहीं है शेर की वो भी मेरे नज़्म की जात पूछते हैं जो राज़ दबा रखा है मेरी ग़ज़लों ने बारहाँ मुझसे आके वही बात पूछते हैं चंद मतलों की भी जिनकी ज़िंदगी नहीं वो भी अब ग़ालिब की औकात पूछते हैं कब तक यूँ जगाओगे हमें महफ़िलों में मुक़र्रर और इरशाद […]

यही मेरे ग़ज़लों की पहचान है

ये मिलाती है,किसी को बाँटती नहीं बस यही मेरे ग़ज़लों की पहचान है अपनी बोली में अपनों की ही बात इसी में बसी मेरे नज़्मों की जान है गर मतला इसका गीता का ध्यान तो मिसरा मस्जिद की अजान है क्या हुआ गर गैर-वतन हैं बच्चियाँ मेरी कविता में तो इनका सम्मान है यूँ तो […]

गीता पढ़ी तो कुरान को पा लिया

तुमको पा कर सब मैंने सब पा लिया ज़मीं, आसमाँ , दो जहाँ को पा लिया जग पूजता रहा गुमनाम फ़रिश्ते को मैंने तुम्हें पूज कर खुदा को पा लिया कोई सीखे मोहब्बत तो मुझसे सीखे कि गीता पढ़ी तो कुरान को पा लिया किसी बच्ची की इज़्ज़त बचाई तो लगा कि अपने अंदर के […]

मेरी ग़ज़ल भी तुम्हारी रोटी जैसी हो जाए

मेरी ग़ज़ल भी तुम्हारी रोटी जैसी हो जाए जिसे खा के किसी पेट की आग मिट जाए हरेक नज़्म हो दर्ज़ी की कैंची के माफिक गर लफ्ज़ बिगड़े तो ज़ुबान तक कट जाए हर हर्फ़ ने छिपा रखा हो आसमाँ का राज़ जो बरसे कभी तो ज़मीं का दिल फट जाए नुक्ते-नुक्ते में हो किसी […]

नींद के धागों से ख्वाब कोई सिलता तो है

मशहूर हो कर भी क्या किया जहॉं में वो बदनाम ही सही सबसे मिलता तो है बात जूनून की है जीवित रहने के लिए कीचड में ही सही कँवल खिलता तो है गैर-अकड़ मुर्दा होने ही की पहचान है हवा चलने पर ज़िंदा इंसां हिलता तो है ग़ुरबत कब जीत पाई है किसी हौसले को […]

क्षितिज पे ही सही दो होंठों को सी लेने दो

कल पूर्णिमा थी,चाँद रात भर जगा होगा सूरज की गोद में कुछ देर तो सो लेने दो 1 हवा जो सोया हुआ है,सफर का थका है पहली बारिश की दो बूंदों को पी लेने दो 2 ये तपिश,ये ठिठुरन सभी तो हरजाई हैं मरहूम फ़िज़ा को थोड़ी देर जी लेने दो 3 बहुत फासले हैं […]

शायद तुम्हें मालूम नहीं है

क्या सुनाना था तुम महफ़िल में ये क्या सुना आए अगले शायर का कद शायद तुम्हें मालूम नहीं है बस एक ही वस्ल की उम्र थी तुम्हारे इंतज़ार की इश्क़ करनेवालों की हद शायद तुम्हें मालूम नहीं है दरिया का उमड़ना देखा है समंदर का तूफाँ बाकी है सरफिरे मौजों का जद शायद तुम्हें मालूम […]

पर ये बताओ कि इन्सान कहाँ ठीक है

जम्हूरियत,मज़मा,तमाशा सब ठीक है पर ये बताओ कि इन्सान कहाँ ठीक है फूल-माला,धूप-अगरबत्ती सब ठीक है पर ये बताओ कि भगवान कहाँ ठीक है रिश्ते-नाते, चौक-चौबारे सब ठीक है पर ये बताओ कि मकान कहाँ ठीक है दुकान,नफा-नुकसान,मुनाफा सब ठीक है पर ये बताओ कि ईमान कहाँ ठीक है पैग़ाम,सच-झूठ,अच्छा-बुरा सब ठीक है पर ये […]

ज़िन्दगी से फिर क्यों गिला मुझे

जितना माँगा, उतना मिला मुझे ज़िन्दगी से फिर क्यों गिला मुझे वही ख़्वाहिशें,वही मरहलें मुझे खुदा फिर एक बार जिला मुझे रहमत अता कर मेरे कर्मों की मेरी हसरतों का दे सिला मुझे मैं जी सकूँ शुकूँ की एक उम्र मौला वही अमृत पिला मुझे दौलत हिकारत न हो जाए ऐसी ही निगाहें दिला मुझे […]