Category Archives: ग़ज़ल (अन्य)

जान लेंगी मेरी आज ये हिचकियां

मुतल्ला गजल : कुमार अरविन्द जान लेंगी मेरी आज ये हिचकियां याद आती रही वस्ल की मस्तियां रास आने लगी जब से तन्हाइयां फुसफुसाती रही रात भर आंधियां कोई जाने हमारी न मजबूरियां दूर रहकर बनाई हैं नजदीकियां उम्र दर उम्र करते रहे गलतियां जान कर भी बजाते रहे तालियां इश्क में बारहा लग चुकी […]

पहलू क्या क्या निकाल रख्खे हैं

हमने सिक्के उछाल रख्खे हैं वो सनम दिल निकाल रख्खे हैं।। तेरी बातो पे था यकीं मुझको गुमाँ क्या क्या जो पाल रख्खे हैं।। पैर में तेरे आज है छाले दर्द हमने ही पाल रख्खे हैं।। संगमरमर की अब है जो मूरत पहलू क्या क्या निकाल रख्खे हैं।। देख सूरत ये आइना हंसता सपने कितने […]

तेरी नज़ाकत किसी काम की नहीं

ज़ुल्म होता रहे और आँखें बंद रहें ऐसी आदत किसी काम की नहीं बेवजह अपनी ही इज़्ज़त उछले तो ऐसी शराफत किसी काम की नहीं बदवाल का नया पत्ता न खिले तो ऐसी बगावत किसी काम की नहीं मुस्कान की क्यारी न खिल पाए तो फिर शरारत किसी काम की नहीं तुम्हें छुए और होश […]

ख़ुदा  है बरमला  छिपता नही है

अमाल उससे कभी छिपता नही है ख़ुदा  है  वो  कभी दिखता नही है ज़मी रोशन सितारों को सजाया ख़ुदा  है बरमला  छिपता नही है। हवा वो है  वही  पानी डगर भी ख़ुदा   है  वो  तुझे  पता नही है। शज़र  में  है  सिवा  तेरे न दूजा हमे  और  कोई  दिखता नही है। जँहा ये है अजब […]

इश्क़ में कोई चूर है तो है |

++ग़ज़ल++(2122 1212 22 ) इश्क़ में कोई चूर है तो है | प्यार करना क़ुसूर है तो है | *** क्यों अना से करूं मैं समझौता आज ख़ुद पर ग़ुरूर है तो है | *** जब पिलाई है मय को आँखों से अब चढ़ा गर सुरूर है तो है | *** पास आने की कोशिशें कर […]

दिन आ गए बहार के काकुल सँवारिये

++एक बेरदीफ़ ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 ) दिन आ गए बहार के काकुल* सँवारिये (*ज़ुल्फ़ें ) मौसम को ख़ुशगवार कुछ ऐसे बनाइये *** वैसे तो पहले वार से ये दिल है नीम जां*(*अधमरा ) बाक़ी है दिल में खूं अभी फिर तीर मारिये *** कितनों का क़त्ल कर चुका रुख़्सार पे जो तिल जाएँ न […]

अहद-ए-वफ़ा का क्या मेरी रुसवाइयों का क्या

++ग़ज़ल++(221 2121 1221 212 ) अहद-ए-वफ़ा का क्या मेरी रुसवाइयों का क्या अफ़सोस अब मनाते ग़लतफ़हमियों का क्या *** पड़ती अदालतों में है तारीख़ें ज्यों हुज़ूर सोचा वो हश्र इश्क़ की सुनवाइयों का क्या *** आता समझ नहीं मुझे होती जो रोज़ रोज़ करना है तेरी याद की सरगोशियों का क्या *** पीछा छुड़ाऊँ या […]

ऐसे दर्द उसने हमारा न देखा

फ़िज़ा में चमकता सितारा न देखा ऐसे दर्द उसने हमारा न देखा ऐसे काट डाले है हमने शज़र को कोई भी बशर में किनारा न देखा तेरा तो बुराई से होगा भला अब भलाई में हमने गुज़ारा न देखा गुमाँ भाईचारा का सबको यहाँ था यूं पहले सरीखा नज़ारा न देखा रिहा जबसे आँखों से […]

“अच्छा लगा”…

°°° यूँ तेरी सोच का सुंदर आकार लेना अच्छा लगा । अपनी ख़्वाहिश को ज़िंदगी में उतार लेना अच्छा लगा । •• मुझे समझने में कुछ वक़्त लगा तुझे , कोई बात नहीं , देर-सबेर अपनी गल्तियाँ सुधार लेना अच्छा लगा । •• ये इश्क़ के ज़ज़्बात और तूफानों का अनजाना भय , फिर भी […]

कपकपाते होंठों पे दुआओं की तरह रख लेना

तुम मुझे निगाहों में ख़्वाबों की तरह रख लेना कपकपाते होंठों पे दुआओं की तरह रख लेना इश्क़ के ज़ख़्म सालते है बहुत देर तलक़ अपने ज़ख्मों पे मुझे दवाओं की तरह रख लेना नए रिश्तों में पुराने धागे काम आते हैं तुम मुझे पुरानी सदाओं की तरह रख लेना बाज़ार में मिलते नहीं बेक़ीमत […]

वो शोलों को राख समझता रहा

वो शोलों को राख समझता रहा हर बार बस यूँ ही जलता रहा दिक्कत खुद की आदतों में थी हर मोड़ बस राह बदलता रहा जन्नत में खुदा की अर्ज़ी लगाई और तमाशबीन से मिलता रहा किस्मत के सहारे सफर पे चला और सूखे पत्ते जैसा हिलता रहा बस दो घडी रौशनी की चाह में […]

रदीफ –हिचकियाँ आई

जब कभी प्रीतम तुमको सोचू शरमाई हिचकियों से बढ़ जाती दिल की तन्हाई. हर समय ना बोलूँ सबको यूँ अफसाने समझ सह पाना मुश्किल सा ये रुसवाई. बहुत साल ताना सहा है खुद में कुढ़ कर अब कहीं मार ही डालेंगी जाना कड़ाई. दखल करें जब भी रोकू मगर घबराई बात तनिक सभले से हमने […]

वो तो हँसी-ठिठोली को ही तरीफां समझ बैठी

वो भीड़ को शोहरत का तकाज़ा समझ बैठी अपनी ग़ज़लों में उन्स को वज़ा समझ बैठी थोड़ा वक़्त,थोड़ा शमा,थोड़ा जुनूँ भी चाहिए वो नज़्म को यूँ बच्चों का खिलौना समझ बैठी तौर-तरीके भी होते हैं हर्फ़ की राज़दारी में वो शेर को मसलन बस लतीफा समझ बैठी हैं फेरहिस्त में और भी सुखनबार इस मर्ज़ […]

निगाहें-कैफियत मिलनी चाहिए

मुझे सजा-ए -गैरत भी उतनी ही मिलनी चाहिए जितनी देर मेरे ज़ख्म को पनाह मिलनी चाहिए दिल मिलने में क्या पता सदियों लग जाएँ यहाँ पहली मुलाक़ात में निगाहें-कैफियत मिलनी चाहिए ये कुछ नए रस्मों-रिवाज़ों का शहर है,सम्भालिये हाथ मिले न मिले लज्जते-बू जरूर मिलनी चाहिए ये बच्चियाँ है इनकी ज़ानिब इतना तो हो जाए […]

पानी के बदन पर कोई अफसाना लिख दो

पानी के बदन पर कोई अफसाना लिख दो दरिया बहुत प्यासा है कोई मुहाना लिख दो बहुत तरसा हुआ है दिल तुम्हारे दीदार को मुझे पल-दो-पल नहीं पूरा ज़माना लिख दो मैं तुम्हें गर पूजता नहीं तो और क्या करता दुनिया कहती है तो मुझे दीवाना लिख दो तुम आ गयी हो चमन में तो […]

जिसको मारे हुश्न बेपरहवाह

इन आइनों को राज़ है पता क्या नाज़नीनों की होती है अदा क्या देखे एक नज़र भर के तो बोले मद में लिपटी होती है हया क्या जिसको मारे हुश्न बेपरहवाह उसे फिर दवा क्या दुआ क्या इश्क़ की लफ़्ज़े कुछ जुदा हैं आँखों से नहीं तो छुआ क्या वफ़ा ज़रूरी ही हर रिश्ते में […]

शौके-दीदार है तो नज़र पैदा कर

जो बुलाया है मुझे तो इतना कर देना किसी की निगाहों में जाम भर देना ।।1।। जो लड़खड़ाने लगे कदम मेरे जानिब किसी की बाँहों में मेरी शाम कर देना ।।2।। बस सब लुटा देना कुछ भी नहीं बचाना ये चंचल शोखी तक मेरे नाम कर देना ।।3।। हो सके तो शबाब से आग लगा […]

“हर अभियान है”…

°°° श्री नरेन्द्र मोदी जी आज सच जन-जन का अभिमान है । बदौलत इनके आज बदल रहा देश की पहचान है । •• गजब का विशिष्ट व्यक्तित्व और दृढ़ है आत्मविश्वास , विश्व-मानचित्र में तिरंगा लहराने का अरमान है । •• क्या था कल उससे ज़रा-सा भी मतलब नहीं है इनको ? आने वाला कल […]

लिखना है…

जो कुछ भी है जितना है मुझ को काफ़ी उतना है यारों का दिल जीत सकूँ ख़्वाब मेरा बस इतना है आँखें सागर से पूछें तुझ में पानी कितना है आग लगाकर है हँसती कैसी ज़ालिम दुनिया है लिखने पर पाबंदी है ‘दीप’ मुझे तो लिखना है भरत दीप 29.06.18

ये कैसी ख्वाहिश की मैंने इश्क़ की

ये कैसी ख्वाहिश की मैंने इश्क़ की जिसे चाहा वही खंज़र भी है कातिल भी ।।1।। हो तो कैसे यकीन इस दुनियादारी की हर मंज़र आज दरयाफ्त भी है फ़ाज़िल भी ।।2।। नशा भी गया उस चाँद के मयारी की जो नींद की चोरी में गवाह भी है शामिल भी ।।3।। इस्तकबाल हो जरुर ऐसी एय्यारी […]