Category Archives: ग़ज़ल (अन्य)

पसीने को बहाने से सदा क़िस्मत सँवरती है

++ग़ज़ल++(१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ ) पसीने को बहाने से सदा क़िस्मत सँवरती है चमक सोने की तपने से ज़ियादा ज्यों निखरती है ** जुनून-ओ जोश से लबरेज मंज़िल पर रखे नज़रें उसी के घर में आ कर कामयाबी पानी भरती है ** दिये सबके बुझाती है महल हो या मकाँ-ए-फ़क़्र अमीरी या ग़रीबी में हवा […]

मेरी मां

बोझ कितना उठा रही है मां। हम को जीना सिखा रही है मां। आज फिर से चमक है आंखों में आज चुल्हा जला रही है मां। आज मैं पेट भर के खाऊंगा आज रोटी पका रही है मां। जख्म कितने बदन पे झेले हैं दर्द फिर भी छुपा रही है मां। आज उपवास है मेरा […]

“सिसकता किसान”…

°°° जीवन में आया ये किस तरह का अनुचित व्यवधान है ? चारों तरफ दिख रहा चुपचाप सिसकता हर किसान है । •• अपनी अनवरत मेहनत से हर किसी का पेट भरता , मगर अन्नदाता का पूरा न हो पाता अरमान है । •• कभी मौसम तो कभी झूठे वादों का दर्द झेलता , इक […]

तुम मिले हो ख़ुदा ख़ुदा कर के

हम  मिले दर्द को छिपा कर के क्या मिला उनसे यूँ वफ़ा करके याद करते है वो भुला कर के फिर बुलाते है वो दुआ कर के पल दो पल की इस ज़िन्दगी में तुम जीत लो दिल यूँ मुस्कुरा कर के हाथ को हाथ में ले कर देखो कर के देखो यूँ फ़ैसला कर […]

ज़िन्दगी की ये सब पिटारी है

2122 1212 22 नाम लब पे यूँ उसका जारी है ज़िन्दगी साथ में गुज़ारी है वक़्त बे-वक़्त जब सियासत हो ये  सियासत  की  चाटुकारी  है धर्म  ईमान  बेच  खाए  सब ये सियासत की ही ख़ुमारी है दे के तकलीफ़ ज़िंदगी में सब लोग करते क्यों फ़ौजदारी है कल तुम्हारी है आज ये हमारी ज़िन्दगी  की  […]

“कर ली है क़याम उम्र”…

°°° यूँ ही गुजरता रहा ये वक़्त , बेवज़ह हुई बदनाम उम्र । क्या खोया-क्या पाया , उलझती रही इसमें सरे-आम उम्र । •• अनगिनत चाहतों का सिलसिला मन से बाहर आता रहा , ख़्वाहिशों के सहारे , हमेशा कटती रही तमाम उम्र । •• कल होगा बेहतर , इस विचार ने ठीक से सोने […]

नहीं मिलता

हमसफ़र मिलने की तरह मुझ से वो, पल गज़र नहीं मिलता साथी तो बहुत नीलम,मगर हमसफ़र नहीं मिलता। हैं मील के पत्थर भी बहुत,ज़रा देखकर चलना सराय हैं हर इक मोड़ पर,मगर घर नहीं मिलता। आशिक तो बहुत मिल जाएं,अगर हां तू कहदे दिलफेंक तो बहुत हैं मगर दिलबर नहीं मिलता। कहते हैं कि बनते […]

ख़ूबसूरत वतन चाहता हूँ

नया अब यहाँ मैं चलन चाहता हूँ सभी के दिलों में लगन चाहता हूँ तड़पता हुआ वो मिले अब कभी ना मचलते दिलों का मिलन चाहता हूँ भरोसा न टूटे यहाँ अब किसी का सभी के लिए मैं अमन चाहता हूँ जहाँ मिल रहेंगे सुख चैन से सब वही ख़ूबसूरत वतन चाहता हूँ यकीं है […]

“असर है”…

°°° ख़ामोश है माहौल , आपसी रंज़िश का असर है । दीवाना है कोई , बेहिसाब क़शिश का असर है । •• विचारों का तालमेल जीने के वास्ते ज़रूरी , मौत आसां हुई आजकल , ये बंदिश का असर है । •• कठोर-दिल भी अब मुस्कुराहट लिए इधर फिर रहा , दिल पिघल ही गया […]

गज़ल [ खुश घर]

जीवन खिला चमन लगता है घर तुझसे ही घर लगता है| सोचों में हर पल खलता है आशियाना असल लगता है| ले मन में चाहत बस तेरी जग थमा बेहतर लगता है| . बादल घने चाँद भी गायब मुरझाया अम्बर लगता है| उस रब की मेहर लगता है आसाँ हर सफर लगता है| रेखा मोहन […]

“शबे-माहताब ऐसा भी”…

°°° काँटों के संग मुस्कुराता , इक गुलाब ऐसा भी । सवाल में ही नज़र आ गया , इक ज़वाब ऐसा भी । •• निगाहें ताड़ लेती हैं मुहब्बत की अदाओं को , छुपा पाया न ये कभी , इक तहे-नक़ाब * ऐसा भी । •• ज़ेहन में किसी को महफ़ूज रखना आसान कहाँ ? […]

आज भी मेरे कान जलते हैं

मुश्किलों से बहुत सँभलते हैं l तेरे कूचे से जब निकलते हैं ll तेरी सांसो की ज़द में आते ही, मेरे एहसास सब पिघलते हैं l लब की थिरकन बयान कर बैठी, तेरे ख़्वाबों में हम मचलते हैं l मख़मली सी छुअन वो होठों की, आज भी मेरे कान जलते हैं l जिनके दिल का […]

किसलिए दिन तू बुरे ज़िंदगी के याद करे

++ग़ज़ल ++(2122 1122 1122 22 /112 ) किसलिए दिन तू बुरे ज़िंदगी के याद करे क्यों गए कल के लिए आज को बर्बाद करे *** तालिब-ए-इल्म किया करते जो ख़िदमत की तरह क्या ज़माना है वही काम अब उस्ताद करे *** बह्र* की तह में पड़े ख़्वाब गुहर देखें यही (*समुन्दर ) कोई तो आये […]

सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब

++ग़ज़ल ++(221 2121 1221 212 /2121 ) सरदार लाज़मी हो असरदार तो जनाब जो चुन सके अवाम के कुछ ख़ार तो जनाब **** ऐसा भी क्या शजर जिसे फूलों से सिर्फ़ इश्क़ कोई हो शाख शाख-ए-समरदार* तो जनाब (*फल से लदी डाली ) *** होगा नसीब में कि न हो बात और है ता-ज़ीस्त रहती […]

चापलूसी के दाम मिला करते हैं

हुज़ूरों की ख़बर रखते थे अख़बार अब अख़बारों की ख़बर हुजूर लिया करते हैं चापलूसी पे लोग हँसा करते थे कभी अच्छे दाम अब उसके भी मिला करते हैं लैम्प पोस्ट की रोशनी में पढ़ाई करके भी नाम रौशन करते थे अधपेटे बच्चे जो बेचते सारे शहर के लैंप पोस्ट वो अखबारों में पहले सफ़्हों […]

बदले में नफ़रत बशर क्या मोहब्बत पे आफ़त नहीं है

मिले नफ़रतों के जो बदले में नफ़रत बशर क्या मोहब्बत पे आफ़त नहीं है दिमाग़ अपना ठंडा करें और सोचें अदावत का बदला अदावत नहीं है *** बनाया ख़ुदा ने गज़ब है बशर को मगर बख़्शी थोड़ी शराफ़त नहीं है गढ़ा ख़ूबसूरत ये किरदार कितना शराफ़त बिना कोई क़ीमत नहीं है *** ख़ुदा ने दिया […]

शहर में अटपटा सा होगा

शहर में वो ज़रा .कुछ अटपटा सा होगा भीड़ के साथ होगा पर कटा सा होगा चीख़ मज़लूमों की तो आई होगी उस तक दिल जो पिघला कलेजा .भी फटा सा होगा उसके कमरे में ज़बरन धूप कब आई है खिड़की वा होगी पर्दा हटा सा होगा सलवटें यूं खबर ताज़ा पे आईं देखो अखबार […]

जिस्म तो मेरा फ़ना हो जाएगा

दर्द जिस दिन बावरा हो जाएगा l रूह का पंछी हवा हो जाएगा ll इक सुकूं की साँस ले लूँ आज तो, कल नया मुद्दा खड़ा हो जाएगा l क्यूँ चले आये हो यूँ ख़्वाबों में तुम, ज़ख्म फिर दिल का हरा हो जाएगा l एक सरगोशी सदा जिस दिन बनी, बस उसी दिन फ़ैसला […]

कौन दुश्मन और जहाँ में कौन अब हमदर्द है

++ग़ज़ल ++(2122 2122 2122 212) कौन दुश्मन और जहाँ में कौन अब हमदर्द है जुस्तज़ू* में रात दिन इसकी ही औरत-मर्द है (*तलाश ) *** भीड़ रिश्तों की रफ़ीक़ों की रक़ीबों की मगर आदमी दुनिया में अक़्सर फिर भी रहता फ़र्द* है (*अकेला ) *** हम जिधर भी हाथ डालें मिल रहा धोका फ़रेब हो […]

तन्हाइयों में बैठ के ख़ुद से लड़ा करें

++ग़ज़ल ++(221 2121 1221 212 ) तन्हाइयों में बैठ के ख़ुद से लड़ा करें मुमकिन नहीं फिर आप किसी का बुरा करें *** लम्हात चंद आपको मिलने ख़ुशी के हैं जब भी नसीब हों इन्हे खुलकर जिया करें *** गर आपको समझना किसी ला-मकीं* का ग़म (*बेघर ) ख़ुद अपने घर से आप भी बेघर […]