Category Archives: ग़ज़ल (संदेशात्मक)

“हुआ कि नहीं…?”

°°° हसरतों को जो मार दिया , वो क़ातिल हुआ कि नहीं ? अपने दिल से पूछ लो , क्या कुछ हासिल हुआ कि नहीं ? •• हज़ूमे-शहर परेशान बहुत इस बात को लेकर , इस दफ़ा नफ़ा की दौड़ में , वो शामिल हुआ कि नहीं ? •• हमेशा सूरत के पीछे भागना क्या […]

दिल की दौलतें

दिलों में बस गईं गर नफ़रतें हैं फ़क़त बस नाम को ही मिल्लतें हैं ( मिल्लत = मेलजोल/मिलाप ) जिहालत से जहाँ में दिक्कतें हैं बिना सर-पैर की बस किल्लतें हैं ज़रा सा जेब में पैसा जो आया कड़क आवाज़ है, ओछी लतें हैं अना में डूबकर रहता वो ऐसे ग़लत लहज़ा, बुरी सी आदतें […]

आश बाकी है अभी

ग़ज़ल चुनाव के लिए प्यास बाकी है अभी। बेसहारों को एक आश बाकी है अभी। हालात ए जिंदगी कैसे बयां हो यहाँ, चंद लम्हों सा विश्वास बाकी है अभी। जुलूस ए कामयाबी दौड़ रही है अब, इम्तहान होना पास बाकी है अभी। काँटों की चुभन कैसे दर्द देती है, भंवरों इसका एहसास बाकी है अभी। […]

“ये कैसी शरारत है…?”

°°° दुनिया में हर किसी को हर किसी से कुछ न कुछ शिकायत है । भूल जाते मगर ये ख़ुद की दूसरों पे क्या इनायत है । •• दूसरों को परेशां करके बहुत ज्यादा आता है मज़ा , आत्म-संतुष्टि के लिए सोचो ये कैसी शरारत है ? •• सच्चा प्यार चिराग़ लेकर ढूँढों तो भी […]

दिल की दौलत

दिलों में बस गईं गर नफ़रतें हैं फ़क़त बस नाम को ही मिल्लतें हैं ( मिल्लत = मेलजोल/मिलाप ) जिहालत से जहाँ में दिक्कतें हैं बिना सर-पैर की बस किल्लतें हैं ज़रा सा जेब में पैसा जो आया कड़क आवाज़ है, ओछी लतें हैं अना में डूबकर रहता वो ऐसे ग़लत लहज़ा, बुरी सी आदतें […]

“ये ज़िंदगी”…

°°° ये ज़िंदगी , ज़िंदगी है यार मेरे बेहाल मत समझना । महसूस करना दोस्त , ख़्वाहिशों का हड़ताल मत समझना । •• अहसासों का क्या है , आना- जाना तो लगा रहता है , सुलझा हुआ है ये हरदम , अनसुलझा जाल मत समझना । •• परवाह हो जब एक-दूसरे का तो क्या ख़ूब […]

“क्या हो गया है…?”

°°° आजकल हर किसी को इस ज़हान में ये क्या हो गया है ? बेवज़ह अपनी किस्मत से कुछ-कुछ फासला हो गया है । •• पर अपनी गलती को मानने को तैयार नहीं इंसां , औ मुकद्दर में कुछ नहीं सोचकर ख़ुद ख़फ़ा हो गया है । •• मेहनत से दूर भागने का इधर हर […]

मज़दूर का बेटा

दरून ए-चशम जाकर कुछ हसीं मंज़र तलाशेगा वो अपनी ज़ात का हिस्सा मेरे अंदर तलाशे गा किसी का थाम ले आँचल अगर मंज़िल की ख़ाहिश है भटकता ही फिरेगा क्या सदा रहबर तलाशेगा दुआओं से भरी होगी तुझे ख़ाली नज़र आई किसी दरवेश की झोली में क्या ख़ंजर तलाशेगा जो गुल डाली से टूटा, टूट […]

“क़दर करते जाना”…

°°° काम कुछ ऐसा हो कि गहरा असर करते जाना । वज़ूद है कुछ अलग , सभी को ख़बर करते जाना । •• ग़म और खुशी एक ही सिक्के के हैं दो पहलू , आशा की किरण के साथ बस सफ़र करते जाना । •• अपनी ख़्वाहिश के चक्कर में ज्यादा उलझना मत , अपने […]

सफ़र में लोग सभी हमसफ़र नहीं होते

++ग़ज़ल ++(1212 1122 1212 22 /112 ) सफ़र में लोग सभी हमसफ़र नहीं होते जो हमसफ़र नहीं वो हमनज़र* नहीं होते(*समान दृष्टि के ) *** किसी ने वादा किया आज वस्ल का वरना हम इतनी देर से यूँ मुंतज़र* नहीं होते (*प्रतीक्षारत ) *** गुरेज़ करता शजर गर पनाह से तो समझ कि साया-दार सभी […]

“चल सको तो चलो”…

°°° सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो । दुनिया की ये भीड़ से जो निकल सको तो चलो । •• राह में बेहिसाब मिलेंगे कंकड़ औ पत्थर , रूकावटों के बीच जो सम्हल सको तो चलो । •• ख़ुद की अकड़ से यहाँ भला नहीं होने वाला , अच्छे-अच्छे साँचे हैं […]

बातों का इंकार

लब पे जब कोई पुराना मिरे नग़मा जागा फिर नया आह-ओ-फ़ुग़ां का कोई लम्हा जागा हमको ख़ुशहाली ने बख़शी है फ़क़त आसाइश दर्द जब चीख़ा सर-ए-बज़म ज़माना जागा बेक़रारी में कटी शब ना मिला चैन कहीं जब तिरी याद का कल रात परिंदा जागा यक-ब-यक हो गया ख़ामोश वो मजमा सारा दर्द में डूबा हुआ […]

जहां की मुहब्बत

तू जब गुनाह की लज़्ज़त में डूब जाएगा कसम ख़ुदा की हलाकत में डूब जाएगा नज़र जो आने लगे झूट आईने में फिर हर एक आदमी हैरत में डूब जाएगा अगर उतार ली दस्तार आपने उस की ग़रीब शख़्स है ग़ैरत में डूब जाएगा झुकेगा सर तिरा सज्दे में बहते पानी पर तू जब ख़ुदा […]

चिराग़ तीरगी से ऊलझा

हर जगह हर किसी से उलझा है आदमी आदमी से उलझा है हौसला तो चिराग़ का देखो किस क़दर तीरगी से उलझा है ख़ुद ही दरिया वो रह गया प्यासा जो मिरी तिश्नगी से उलझा है इब्न-ए-आदम तो असर-ए-हाज़िर का अपनी ही बेखुदी से उलझा है तल्ख़ लहजा तुम्हारी बातों का मेरी शाइस्तगी से उलझा […]

दहेकते रास्ते

हमारी अक़्ल पर ताले पड़े हैं खन्डर है ज़हन और जाले पड़े हैं बज़ाहिर साफ़ आते हैं नज़र दिल मगर अंदर से तो काले पड़े हैं ये पहला तो नहीं है आस्तीं में बहुत से साँप हम पाले पड़े हैं मयस्सर कैसे हो दो वक़्त रोटी कि जब इक वक़्त के लाले पड़े हैं करें […]

गुलज़ार है आतिश

लगी है जिससे कारी ज़र्ब वो पत्थर सलामत है जो तुमने पीठ पर मारा था वो ख़ंजर सलामत है तास्सुब और हसद के बेशतर शोले उठे लेकिन ख़ुदा का शुक्र है बस्ती में मेरा घर सलामत है परेशां हो नहीं सकता कभी वो शख़्स दुनिया में ख़ुदा-ए-पाक का जिसके भी दिल में डर सलामत है […]

कुफ़्फ़ार के लश्कर

हों जो हक़ पर तो बहत्तर नहीं देखे जाते रन में कुफ़्फ़ार के लश्कर नहीं देखे जाते हम हुसैनी हैं कटा देंगे सरों को हमसे दर पे बातिल के झुके सर नहीं देखे जाते अज़्म ए कामिल है तो मंज़िल की तरफ़ बढ़ते रहो फिर निशाँ पांव के मुड़ कर नहीं देखे जाते ये बग़ावत […]

दरवेश की झोली

अपनी फ़ित्रत में दग़ा जिसने बसा रखी है तुमने उम्मीद-ए-वफ़ा उस से लगा रखी है चूड़ियां तोड़ दी सिंदूर मिटाया जिनका उनकी मासूम हथेली पे हिना रखी है ख़ौफ़ इन बुझते चराग़ों से उसे हो कैसे जिसने सूरज से कभी आँख मिला रखी है भीक तालाब से वो मांगे ये मुम्किन ही नहीं जिसने ख़ुद […]

“पिता”… जीवन का आधार…

°°° रिश्ता अनमोल है , पिता जीवन का आधार है । दिखता नहीं मगर पिता में छुपा अनंत प्यार है । •• सभी रिश्तों की परवाह रहता है जिसे हरदम , सारे घर की जान , पिता संपूर्ण परिवार है । •• बाहर से कठोर मगर अंदर से बेहद कोमल , अनुशासन है मगर स्नेह […]

औरत खामोश रही होगी

दिल की ही सुनी होगी दिल से ही कही होगी| वो आँख न वैचारी बे वजह बही होगी| ++ दौलत में हुनर कब था इन्सान बनाने का, दीवार अदावत की उल्फत से ढही होगी| ++ रूकती न हिचकियों का इल्जाम किसे मैं दूँ, तोड़ा था ये दिल मेरा दावे से वही होगी| ++ हँसकर जो […]