Category Archives: हास्य / व्यंग

“आजकल खूब टैलेंट चाहिए”…

°°° चेहरे की भाव-भंगिमा को बदल दे , अभी वो पेंट चाहिए । एक ही सब्जी पसंद नहीं , हर रोज सब्जी डिफरेंट चाहिए । •• हाये इन हसीनाओं की फ़रमाईश से बचाये कोई तो , इनके दिल में कुछ भी ख़्वाहिश क्या हुई , वो चीज़ अर्जेंट चाहिए । •• बड़े अज़ीब हैं क्या […]

बीवी की चाहत

चाहिए एेसी बीवी जो करती व्हात्सप चैट हो चर्चा चलती गुगल पे युटूयब अपनी साइट हो फेसबुक से करती अपनी स्टेटस पल पल अपटुडेट हो चाहिए ऐसी बीवी जो करती व्हात्सप चैट हो 4जी सी चाल हो उसकी LIC सा वादा हो काली हो या गोरी बस मिलती मुझ से माइंड हो जीवन सारी साथ […]

बिल्ली के गले में घंटी

बिल्ली के गले में घंटी भला कौन बांधेगा भाई I कितने बरसों बीत गए, समस्या सुलझ न पाई I कुछ लेखक-विचारक चूहे उठे और निर्भय होकर I जमकर कोसा रचनाओं में ..बड़ी आवाज उठाई I ज्यादा बुलंदी पर पहुँचा जब स्वर, तब बिल्ली ने I उग्र देशभक्त चूहों की एक सुन्दर सी सभा बुलाई I […]

जय जयकार गधों की है

चारों कौनो मे गूंज रही , वो जय जयकार गधों की है । देश को है जो लूट रहे , ऐसी सरकार गधों की है ॥ पल पल संसद मे होती , वो हाहाकार गधों की है । गांव से लेकर शहरों तक , बस भरमार गधों की है ॥ (देश को जो है लूट […]

सुल्तान ए इश्क

अंग्रेजी के तीन शब्द महान है अनपढ़ को भी कराते ग्रामर का ज्ञान है दिल कह दे दिल को ❤आई लव यू❤ और उस दिल से सुन ले ❤लव यू टू❤ दिल को धड़कन मिले सहमति की जैसे जीत डाला  पाकिस्तान है 😀 समझे खुद को हीरो फ़िल्म का कदमों तले पूरा फिल्मिस्तान है  😎 […]

बुरा जो देखन मैं चला

संमस्या पर विचार विमर्श विषय न तुम करो न हम करे ,,,, बुराई निंदा को ख़त्म करें । *बुरा जो देखन मैं चला* , *बुरा न मिलयो कोय*। *जो देखन आपसा* *मुझसा बुरा न कोय।।* सूफी कवि कबीर दास जी ने आज से लगभग 600 साल पहले ये बात समझाने की कोशिश समाज सुधार के […]

बहू कामना – कुंडलियाँ

सास बहु बैठे कहते , कितनी प्यारी बात । मुख फुलाये पग सिमटे , किसके चिकने पात ।। किसके चिकने पात ,जने नहीं पूत कपूत । नंदी बैल रहा कभी ,था वही मेरा सपूत । बना गई वह दास ,छुटे मंतर यही आस। बहु सोच रही ख़ास ,परलोक सिधारे सास ।। नवीन कुमार तिवारी ,,

डिजिटाइजेशन के दौर में,

  उम्र पुरानी है, तस्वीर पुरानी है । प्रोफ़ाइल में , यौवना बनी नानी है । आते नही फिर, गुजरे दिन वापस, वो भी एक कहानी थी , यह भी एक कहानी है। डिजिटाइजेशन के दौर में, रंगीन हुई बूढ़ी नानी है । ….”निश्चल” विवेक….

कह मुकरियां

उस से जो मै मिल ना पाऊँ सच कितना ही मैं घबराऊँ मिले चैन, देखु जब तेरा लुक का सखी साजन,ना सखी फेसबुक।। जब से वो जीवन मे आया कितना सुकून मैंने पाया कर ना पाउँ खाना भी कुक का सखी साजन,ना सखी फेसबुक।। वो ही मेरे जीवन का सार वो ही बना है अब […]

टेंशन

रोहन कुछ दिनों से थोड़ा सुस्त सा नजर आ रहा था । ठीक से खाना पीना भी नही कर रहा था ,,दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने भी नही जाता था । चूँकि फाइनल एग्जाम नजदीक थे तो उसे इतना तनाव लेते देख कर सब उसके दादाजी ने पास बुलाकर कहा . “बेटा आजकल बड़े टेंशन […]

कुण्डलिया

१)लिखते लिखते थक गई समझ नही कछु आत ! कभी कहीं मात्रा बढ़ी.. भटक कही लय जात !! भटक कही लय जात …फसे हैं नाप तोल में ! नींद उड़ गई रात ……गुजर गइ इसी झोल में !! किसे कहे संध्या …….स्वप्न में कुंडल दिखते ! भूली में सब छंद ..कुंडलिया लिखते लिखते !! २) […]

पत्नी चालीसा….. समर्पयामि

पत्नी चालीसा….. समर्पयामि …………… तुम बिन होत नहीं कारत कोई। विपदा आई पति पर, जब..जब तुम सोई।। चारों धाम की तीर्थ तुम्ही हो…… तुम ही काशी… तुम ही मथुरा……… मैं दीन-हीन, दरिद्र पशु नर बेकारा। सर्वस्त्र तुम्ही हो, तुम्हारा जयकारा।। बेलन ज्यों-ज्यों, तुम्हरे हाथ में आया, पति बेचारा त्यों -त्यों चिल्लाया।। तुम बिन यज्ञ, मंगल […]

महफ़िल में दरोगा बुला रख्खे हैं..

उजले कपडों से दाग अपने दामन के छुपा रख्खे हैं । छोड़ो भी यार वकीलों से रिश्ते तुमने बना रख्खे हैं ॥ एक मेरी ऊँगली उठाने से भला क्या होगा हासिल । तुमने तो अपनी महफ़िल में दरोगा बुला रख्खे हैं ॥ -कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

अब कम से कम बैंक में ग्यारह सौ तो पड़े रहने दो …

एक बैंक के मैनेजर साहब से मैनें कहा – सर मात्र ग्यारह सौ का लोन चाहिये 🙏 मैनेजर बाल खुजाते बोले – यार ग्यारह हज़ार करोड़ लेकर वो चलते बने … अब कम से कम बैंक में ग्यारह सौ तो पड़े रहने दो 👏👏 😊 -कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

व्यंग्य तो सत्य कहता है..

शिल्पकार के हाथ में हथौड़ा और छैनी होना चाहिए। व्यंग्य की कलम में धार तेज़ और पैनी होना चाहिए।। व्यंग्य ही हमें सच मायने में आईना दिखाता है। व्यंग्य तो सत्य कहता है हँसता है मुस्कराता है।। -कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

थोड़ा सरकारी लगता है

मैं तुम्हारी हर बात का एतवार तो कर लूं। पर हर भरोसा तुम्हारा सियासी लगता है।। और तुमने कह दिया, बस एक कपड़े में चले आओ। पर तुम्हारा ये दिलासा भी थोड़ा सरकारी लगता है।। -कवि योगेंद्र व्यंग्यकार

ख़याली पकौड़े

शब भर रहा परेशाँ क्या वो मुझे छोड़ देगी ? कहीं वो नाराज़ तो नहीं ? नहीं नहीं मैं उसे मना लूँगा हुई सहर तो याद आया कौन वो ? वो तो कोई है ही नहीं (हैं तो सिर्फ ख़याली पकौड़े) हाँ नई तो