Category Archives: चयनित मशहूर रचनाएँ

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

पद्मश्री  डॉ. बशीर बद्र की बेमिसाल ग़ज़ल आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं […]

ऐ भाई , जरा देख के चलो , आगे ही नहीं पीछे भी

गीतों के राजकुमार गोपालदास नीरज का गीत ऐ भाई , जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी ऐ भाई तू जहाँ आया है वो तेरा घर नहीं, गाँव नहीं गली नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, बस्ती नहीं दुनिया है, और प्यारे, दुनिया यह […]

आदमी को आदमी बनाने के लिए 

महाकवि श्री गोपालदास नीरज की कविता आदमी को आदमी बनाने के लिए जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए और कहने के लिए कहानी प्यार की स्याही नहीं , आँखों वाला पानी चाहिए जो भी कुछ लुटा रहे हो तुम यहाँ वो ही बस तुम्हारे साथ जाएगा जो छुपा के रखा है तिजोरी में वो तो […]

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

शायर बशीर बद्र की ग़ज़लें परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहां दरिया समन्दर में मिले दरिया नहीं रहता हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में अजब माँ हूँ कोई बच्चा मेरा ज़िंदा नहीं […]

खिलते हैं गुल यहाँ ,खिलके बिखरने को

गोपाल दास नीरज का फ़िल्म के लिए लिखा गया गीत खिलते हैं गुल यहाँ ,खिलके बिखरने को मिलते हैं दिल यहाँ , मिलके बिछड़ने को खिलते हैं गुल यहाँ ,खिलके बिखरने को मिलते हैं दिल यहाँ , मिलके बिछड़ने को कल रहे ना रहे, मौसम ये प्यार का कल रुके न रुके, डोला बहार का […]

दिल आज शायर है , ग़म आज नग़मा है

गोपाल दास नीरज का फ़िल्म के लिए लिखा गया गीत दिल आज शायर हैं, ग़म आज नग्मा हैं ,शब ये ग़ज़ल हैं सनम गैरों के शेरों को ओ सुननेवाले, हो इस तरफ भी करम आ के ज़रा देख तो तेरी खातिर हम किस तरह से जिये आँसू के धागे से सीते रहे हम जो ज़ख्म तूने दिये […]

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव में मेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले न […]

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे

महाकवि श्री गोपालदास नीरज की कविता स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई, पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई, पात-पात झर […]

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

 हिंदी ,उर्दू  के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता कहाँ […]