Category Archives: ग़ज़ल

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख्त न था इतने मसरूफ़ थे हम जाने के तैयारी में खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था मैं जिस की खोज में ख़ुद खो गया था मेले में कहीं वो मेरा ही एहसास तो कमबख्त न […]

ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है

मशहूर शायर बशीर बद्र की ग़ज़ल ये चाँदनी भी जिन को छूते हुए डरती है दुनिया उन्हीं फूलों को पैरों से मसलती है शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख दे यूँ याद तेरी शब भर सीने […]

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

शायर बशीर बद्र की ग़ज़ल वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी की ग़ुलाम है यहाँ एक […]

कोई न जान सका वो कहाँ से आया था 

बशीर बद्र की ग़ज़लें कोई न जान सका वो कहाँ से आया था और उसने धुप से बादल को क्यों मिलाया था यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नहीं मकान छोटा था लेकिन बहुत सजाया था वो अब वहाँ हैं जहाँ रास्ते नहीं जाते मैं जिसके साथ यहाँ पिछले साल आया था सुना है […]

हम तेरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे

महाकवि गोपाल दास नीरज की ग़ज़ल हम तेरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे इतना मालूम है ख़ामोश है सारी महफ़िल पर न मालूम ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी , न ,बरहमन, न वो शेख वो कोई और […]

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए

महाकवि गोपाल दास नीरज की ग़ज़ल अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए प्यार का […]

होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते

शायर बशीर बद्र की ग़ज़लें होठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते साहिल पे समंदर के ख़ज़ाने नहीं आते पलके भी चमक उठती हैं सोते में हमारी आंखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते दिल उजडी हुई इक सराय की तरह है अब लोग यहां रात बिताने नहीं आते उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ […]

रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए

शायर बशीर बद्र की ग़ज़लें रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आए बस गई है मिरे अहसास में ये कैसी महक कोई ख़ुशबू मैं लगाऊँ तिरी ख़ुशबू आए उसनें छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया मुद्दतों बाद मिरी आँखों में आँसू आए उसकी […]

पत्थर के जिगर वालों ग़म में वो रवानी है

शायर बशीर बद्र की ग़ज़लें पत्थर के जिगर वालों ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है फूलों में ग़ज़ल रखना ये रात की रानी है इस में तेरी ज़ुल्फ़ों की बे-रब्त कहानी है एक ज़हन-ए-परेशां में वो फूल सा चेहरा है पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है […]

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो

पद्मश्री  डॉ. बशीर बद्र की ग़ज़ल कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो वो बड़ा रहीमो करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो मेरे […]

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

मशहूर शायर बशीर बद्र की ग़ज़ल सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर भेजा वही काग़ज़ उसे […]