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शांतिदीप
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07-12-2017
रचनाकार
Lecturer
Biswan/Sitapur/Uttar pradesh
तुम्हारी गंध का मन प्राण में आवास तो कर लूँ तुम्ही हो पास में इस बात का विश्वास तो कर लूँ कली महकी नही कोई कभी मन के मरुस्थल में घडी भर ही सही मधुमास का आभास तो कर लूँ प्रवासी ये चरण इस पथ न जाने कब पुनः लौटे तुम्हारा रूप पलकों में बसा लूँ तो चले जाना।
शांतिदीप
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