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shkiha SHIKHA Naari
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15-03-2018
रचनाकार
TEACHING
TIRUPATI/CHITTOR/ANDHRA PRADESH/INDIA
DDU UNIVERSITY Gorakhpur (UP)
मैं हूँ खुद कागज़ दिल बन के ,खुद तृष्णा हूँ सावन बन के, कहते हैं सब मैं बदली हूँ, जो बरसेगी सूखे मन पे , पर उड़ जाती हूँ तन्हा मैं ,कोई बिछड़ा सपना बन के।
A EMOTIONAL FREE LANCE POETESS
shkiha
SHIKHA Naari
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काग़ज़ दिल रचना (1) मुक्तक (वेदना) (1) कविता (प्रेम) (1) कविता (अन्य) (1)

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