कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो

पद्मश्री  डॉ. बशीर बद्र की ग़ज़ल

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीमो करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महवे ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल है जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चाँदनी
न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चिराग़ ये घर न हो

कभी दिन की धूप में झूम कर कभी शब के फूल को चूम कर
यूँ ही साथ साथ चले सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब आ ज़रा और दिल के करीब आ
तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं कि बिछड़ने का कभी डर न हो

★★★★★★★

……….  ग़ज़ल – बशीर बद्र  ( सैयद मोहम्मद बशीर )
………..ग़ज़ल गायक – जगजीत सिंह
……….. एल्बम – सजदा

         

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