कोई न जान सका वो कहाँ से आया था 

बशीर बद्र की ग़ज़लें

कोई न जान सका वो कहाँ से आया था
और उसने धुप से बादल को क्यों मिलाया था

यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नहीं
मकान छोटा था लेकिन बहुत सजाया था

वो अब वहाँ हैं जहाँ रास्ते नहीं जाते
मैं जिसके साथ यहाँ पिछले साल आया था

सुना है उस पे चहकने लगे परिंदे भी
वो एक पौधा जो हमने कभी लगाया था

चराग़ डूब गए कंपकपाये होंठों पर
किसी का हाथ हमारे लबों तक आया था

तमाम उम्र मेरा दम इसी धुएं में घुटा
वो एक चराग़ था मैंने उसे बुझाया था

★★★★★★★
ग़ज़ल – बशीर बद्र  ( सैयद मोहम्मद बशीर )

         

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