रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए

शायर बशीर बद्र की ग़ज़लें

रात आँखों में ढली पलकों पे जुगनू आए
हम हवाओं की तरह जा के उसे छू आए

बस गई है मिरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू मैं लगाऊँ तिरी ख़ुशबू आए

उसनें छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया
मुद्दतों बाद मिरी आँखों में आँसू आए

उसकी आँखें मुझे मीरा का भजन लगती हैं
पलकें झपकाए तो लोबान की ख़ुशबू आए

मेरा आईना भी अब मेरी तरह पागल है
आईना देखने जाऊँ तो नज़र तू आए

किस तकल्लुफ़ से गले मिलने का मौसम आया
फूल काग़ज़ के लिए काँच के बाज़ू आए

उन फ़क़ीरों को ग़ज़ल अपनी सुनाते रहियो
जिनकी आवाज़ में दरगाहों की ख़ुशबू आए

वक़्त-ए-रुख़स़त कहीं तारे, कहीं जुगनू आए
हार पहनाने मुझे फूल से बाज़ू आए

मैंने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी
कोई आहट ना हो दर पै मिरे और तू आए

उसकी बातें कि गुल-ओ-लाला पै शबनम बरसे
सब को अपनाने का उस शोख़ को जादू आए

इन दिनों आपका आ़लम भी अ़जब आ़लम है
शोख़ खाया हुआ जैसे कोई आहू आए

★★★★★★★
ग़ज़ल – बशीर बद्र  ( सैयद मोहम्मद बशीर )
ग़ज़ल गायक – जगजीत सिंह
एल्बम – तुम तो नहीं हो

         

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