वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

शायर बशीर बद्र की ग़ज़ल

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है

बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी
ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी की ग़ुलाम है

यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तेरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सजदा हराम है

मैं ये मानता हूँ मेरे दिए तेरी आँधियों ने बुझा दिए
मगर एक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है

मेरा फ़िक्र-ओ-फ़न तेरी अंजुमन न उरूज था न ज़वाल है
मेरा लब पे तेरा ही नाम था मेरे लब पे तेरा ही नाम है

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निज़ाम – प्रबंध, व्यवस्था , हैदराबाद के शासकों की उपाधि
सजदा – माथा टेकना , सिर झुकाना
इमाम — अगुआ , धर्म का नेता , मुसलमान पुरोहित
ज़वाल – आफत, झँझट, विपत्ति
उरूज – शीर्षबिन्दु, उत्कर्ष ,उत्थान, बुलंदी

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ग़ज़ल – बशीर बद्र  ( सैयद मोहम्मद बशीर )

         

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