हम तेरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे

महाकवि गोपाल दास नीरज की ग़ज़ल

हम तेरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे

इतना मालूम है ख़ामोश है सारी महफ़िल
पर न मालूम ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी , न ,बरहमन, न वो शेख
वो कोई और थे जो तेरे मकाँ तक पहुँचे

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ
कल को शायद मेरी आवाज़ वहाँ तक पहुँचे

चाँद को छू के चले आए हैं विज्ञान के पंख
देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुँचे

★★★★★★★
ग़ज़ल – गोपाल दास ‘नीरज

         

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